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पढ़िए मकर संक्रांति की पौराणिक कथा: गंगा अवतरण और राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष की कथा

मकर संक्रांति की पौराणिक कथा: भारत के प्रमुख धार्मिक पर्वों में शामिल मकर संक्रांति न केवल सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक है, बल्कि इससे जुड़ी पौराणिक कथा इसे विशेष आध्यात्मिक महत्व भी प्रदान करती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है और जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है। इस विश्वास के पीछे एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रेरणादायक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जो राजा सगर, उनके वंश और मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण से संबंधित है।

राजा सगर ने किया था यज्ञ का आयोजन 

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा सगर अपने परोपकार, धर्मनिष्ठा और पुण्य कर्मों के कारण तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गए थे। चारों ओर उनके यश का गुणगान होने लगा। परिणामस्वरूप, देवताओं के राजा इंद्र को यह आशंका सताने लगी कि कहीं राजा सगर स्वर्ग के अधिपति न बन जाएं। इसी समय राजा सगर ने अपनी सामर्थ्य और धर्मबल को स्थापित करने के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया।

जानिए क्यों चाहते थे इंद्रदेव 

हालाँकि, इंद्र देव ने यज्ञ को विफल करने के उद्देश्य से अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को चुरा लिया और उसे महर्षि कपिल के आश्रम के समीप बांध दिया। जब यज्ञ का घोड़ा गायब होने की सूचना मिली, तब राजा सगर ने अपने 60 हजार पुत्रों को घोड़े की खोज के लिए चारों दिशाओं में भेजा। खोज करते-करते सभी राजकुमार कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँच गए, जहाँ उन्होंने यज्ञ का घोड़ा देखा।

इस दृश्य को देखकर, दुर्भाग्यवश, राजा सगर के पुत्रों ने कपिल मुनि पर घोड़ा चुराने का आरोप लगा दिया। इस आरोप से महर्षि कपिल अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने तपोबल से राजा सगर के सभी 60 हजार पुत्रों को श्राप देकर भस्म कर दिया। यह घटना राजा सगर के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन गई।

जब राजा सगर को इस भयानक समाचार का ज्ञान हुआ, तो वे व्याकुल होकर कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे और अपने पुत्रों की मुक्ति के लिए क्षमा याचना की। तब महर्षि कपिल ने कहा कि राजा सगर के पुत्रों को मोक्ष तभी प्राप्त होगा, जब मोक्षदायिनी मां गंगा को पृथ्वी पर लाया जाएगा और उनके जल से पुत्रों का उद्धार होगा।

राजा सगर के पोते ने लिया था संकल्प 

इसके बाद राजा सगर के पोते राजकुमार अंशुमान ने यह संकल्प लिया कि वे मां गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या करेंगे। यद्यपि वे अपने जीवनकाल में इस कार्य को पूरा नहीं कर सके, लेकिन उनके पुत्र राजा भगीरथ ने इस महान उद्देश्य को पूरा करने का प्रण लिया। राजा भगीरथ ने वर्षों तक कठिन तपस्या कर मां गंगा को प्रसन्न किया।

हालाँकि, मां गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि यदि वे सीधे पृथ्वी पर उतरतीं, तो संपूर्ण सृष्टि का विनाश हो सकता था। इसलिए राजा भगीरथ ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तप किया। भगवान शिव ने अपनी जटाओं में मां गंगा को धारण किया और उनके वेग को नियंत्रित कर पृथ्वी पर अवतरित किया। इसी कारण भगवान शिव को **गंगाधर** कहा जाता है।

अब जानिए क्यों मनाई जाती है मकर संक्रांति 

इसके उपरांत, मां गंगा राजा भगीरथ के पीछे-पीछे पृथ्वी पर प्रवाहित होती हुई कपिल मुनि के आश्रम पहुँचीं। वहाँ उनके पवित्र जल से राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष की प्राप्ति हुई। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जिस दिन यह घटना घटी, वही दिन मकर संक्रांति का था।

इसके बाद मां गंगा आगे बढ़ते हुए समुद्र में समाहित हो गईं। जहाँ गंगा सागर से मिलती हैं, वह स्थान गंगासागर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज भी मकर संक्रांति के अवसर पर गंगासागर और गंगा नदी में स्नान करने की परंपरा है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन स्नान, दान और पुण्य कर्म करने से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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