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Dharmik Morning: सूर्य भगवान के रथ के सात क्यों हैं घोड़े: पौराणिक मान्यता से विज्ञान तक, जानिए रहस्य

Dharmik Morning: हिंदू धर्मग्रंथों और पौराणिक कथाओं में भगवान सूर्य को ऊर्जा, प्रकाश और जीवन का मूल स्रोत माना गया है। वे प्रतिदिन अपने दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर सम्पूर्ण संसार का भ्रमण करते हैं। विशेष बात यह है कि इस रथ को सात घोड़े खींचते हैं, जिनके नाम—गायत्री, भ्राति, उष्णिक, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप और पंक्ति—वेदों में वर्णित छंदों से जुड़े माने जाते हैं। वर्षों से यह मान्यता प्रचलित है कि ये सात घोड़े सप्ताह के सात दिनों का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन इसके पीछे के अर्थ केवल पौराणिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक भी हैं।

जानिए सात घोड़े और प्रकाश का वैज्ञानिक संकेत

यदि पौराणिक व्याख्या से हटकर सामान्य दृष्टि से देखा जाए, तो सूर्य भगवान के रथ के सात घोड़े सूर्य के प्रकाश का प्रतीक भी माने जाते हैं। जैसा कि विज्ञान स्पष्ट करता है, सूर्य का श्वेत प्रकाश जब किसी माध्यम से गुजरता है, तो वह सात विभिन्न रंगों में विभाजित हो जाता है। यही सात रंग—बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल—मिलकर इंद्रधनुष का निर्माण करते हैं।

इंद्रधनुष से भी जुड़ा है पौराणिक संकेत

जब सूर्य की किरणें एक बिंदु से निकलकर आकाश में फैलती हैं, तब वे सात रंगों का भव्य इंद्रधनुष बनाती हैं। इसी क्रम में माना जाता है कि सूर्य भगवान के रथ के सात घोड़े इन सात रंगों के प्रतीक हैं। यही कारण है कि पौराणिक चित्रों और मूर्तियों में प्रत्येक घोड़े का रंग एक-दूसरे से अलग दर्शाया गया है।

एक शरीर, सात सिर: पढ़िए इसका प्रतीकात्मक संदेश

हालांकि अधिकांश मूर्तियों में सूर्य रथ के साथ सात अलग-अलग घोड़े दिखाए जाते हैं, लेकिन कई स्थानों पर एक ही घोड़े के सात सिर बनाए गए हैं। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे सूर्य से एक ही स्रोत से सात रंगों की किरणें निकलती हैं, वैसे ही एक ही मूल ऊर्जा से सात घोड़ों की उत्पत्ति मानी गई है। इस प्रतीक के माध्यम से सूर्य को ब्रह्मांडीय ऊर्जा का केंद्र बताया गया है।

सारथी अरुण का क्यों रहता है विशेष स्थान

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य भगवान के रथ का संचालन अरुण देव करते हैं, जिन्हें सूर्य का सारथी कहा जाता है। रोचक तथ्य यह है कि अरुण देव रथ चलाते समय भी सूर्य भगवान की ओर मुख करके बैठते हैं। इसे सूर्य की तेजस्विता और दिव्यता के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

केवल एक पहिया, लेकिन गहरा है इसका अर्थ – पढ़िए 

सूर्य भगवान के रथ में केवल एक ही पहिया बताया गया है, जो सामान्य दृष्टि से असंभव प्रतीत होता है। किंतु इस पहिए में 12 तीलियाँ लगी हुई हैं। पौराणिक व्याख्या के अनुसार यह पहिया एक वर्ष का प्रतीक है, जबकि उसकी 12 तीलियाँ वर्ष के 12 महीनों को दर्शाती हैं। इस प्रकार सूर्य का रथ समय चक्र का भी प्रतिनिधित्व करता है।

ऋतुओं का आधार माना जाता है सूर्य रथ

इसके अतिरिक्त, पुराणों में उल्लेख मिलता है कि सूर्य भगवान के रथ के साथ 60 हजार वल्खिल्य ऋषि चलते हैं, जो आकार में अंगूठे जितने छोटे होते हैं। वे निरंतर सूर्य की आराधना करते हैं। वहीं गांधर्व संगीत प्रस्तुत करते हैं, अप्सराएं नृत्य करती हैं और नागगण उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं। इन्हीं दिव्य क्रियाओं के आधार पर पृथ्वी पर ऋतुओं का विभाजन होता है।

अंत में जानिए पौराणिकता और विज्ञान का है संगम

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सूर्य भगवान का रथ केवल एक धार्मिक कल्पना नहीं, बल्कि उसमें समय, प्रकाश, ऊर्जा और ऋतु चक्र जैसी वैज्ञानिक अवधारणाएं भी छिपी हुई हैं। यही कारण है कि भारतीय सनातन परंपरा में सूर्य को न केवल देवता, बल्कि जीवनदायी शक्ति के रूप में पूजा जाता है।

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