गैंगस्टर एक्ट केस में अब्बास अंसारी को सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत, कड़ी शर्तों के साथ बड़ी राहत

नई दिल्ली। मऊ सदर से विधायक और दिवंगत माफिया मुख्तार अंसारी के पुत्र अब्बास अंसारी को गैंगस्टर एक्ट के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने उन्हें नियमित जमानत प्रदान कर दी है। इससे पहले अब्बास अंसारी को अंतरिम जमानत दी गई थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने नियमित जमानत में परिवर्तित कर दिया है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह राहत सख्त शर्तों के अधीन दी गई है और किसी भी प्रकार की लापरवाही या उल्लंघन पर इसे वापस लिया जा सकता है।
CJI सूर्यकांत की पीठ ने सुनाया अहम फैसला
यह महत्वपूर्ण फैसला भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जमानत कोई अधिकार नहीं बल्कि न्यायिक विवेक पर आधारित राहत है, जो केवल कानून के दायरे में रहते हुए ही दी जा सकती है।
इसके साथ ही, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी को जमानत मिलने का अर्थ यह नहीं है कि वह कानून से ऊपर है। बल्कि उसे न्यायिक प्रक्रिया का पूर्ण सम्मान करना होगा।
जमानत के साथ लगाईं गईं सख्त शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में अब्बास अंसारी पर कई कड़ी शर्तें लागू की हैं। सबसे पहले, उन्हें उत्तर प्रदेश से बाहर जाने से पूर्व स्थानीय पुलिस और प्रशासन को पूर्व सूचना देना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, वे जांच प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे और न ही किसी गवाह को प्रभावित करने का प्रयास करेंगे।
इसके साथ ही, अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अब्बास अंसारी कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। यदि वे किसी भी शर्त का उल्लंघन करते पाए गए, तो जमानत तत्काल प्रभाव से रद्द की जा सकती है।
न्यायालय और जांच एजेंसियों को सहयोग अनिवार्य
अदालत ने स्पष्ट किया कि अब्बास अंसारी को आगामी सभी सुनवाइयों में अदालत के समक्ष उपस्थित रहना होगा और जांच एजेंसियों को पूरा सहयोग देना होगा। इसके अलावा, उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनके किसी भी कार्य से सार्वजनिक शांति या प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित न हो।
यह भी उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखना सर्वोपरि है और आरोपी को इस दायित्व को गंभीरता से लेना होगा।
राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा
इस फैसले के बाद राजनीतिक और कानूनी गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। एक ओर जहां इसे कानून के तहत संतुलित न्यायिक निर्णय माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह संदेश भी दिया गया है कि गंभीर मामलों में राहत मिलने के बावजूद आरोपी पर न्यायिक निगरानी बनी रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला इस बात का उदाहरण है कि न्यायपालिका व्यक्ति नहीं, बल्कि कानून और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेती है। साथ ही, यह भी स्पष्ट होता है कि जमानत मिलने के बावजूद कानूनी जवाबदेही समाप्त नहीं होती।



