UP: इस्तीफा वापस लेने के बाद घिरे GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत सिंह, पढ़िए क्लीन चिट के दावे पर CMO का खंडन

उत्तर प्रदेश: एक बार फिर प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। अयोध्या में तैनात GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत सिंह का नाम इन दिनों लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में दिया गया उनका इस्तीफा, फिर उसका वापस लिया जाना और अब उन पर लगे नए आरोप इन सभी घटनाओं ने पूरे मामले को और अधिक उलझा दिया है।
हालांकि प्रशांत सिंह ने सार्वजनिक रूप से अपने ऊपर लगे कुछ आरोपों को खारिज करते हुए खुद को निर्दोष बताया है, लेकिन ताजा घटनाक्रम में उनके दावों पर प्रशासनिक स्तर से सवाल उठने लगे हैं।
इस्तीफा और उसकी वापसी से शुरू हुआ विवाद
दरअसल, प्रशांत सिंह ने हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा की थी। उस समय उन्होंने कहा था कि वे राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों से आहत हैं। हालांकि, कुछ ही समय बाद उन्होंने अपना इस्तीफा वापस ले लिया।
इस्तीफा वापस लेने के बाद यह मामला शांत होता नजर आ रहा था, लेकिन इसके तुरंत बाद नए आरोप सामने आने लगे। इससे साफ है कि मामला अब केवल इस्तीफे तक सीमित नहीं रह गया है।
दिव्यांगता प्रमाण पत्र का मामला
प्रशांत सिंह ने दावा किया था कि उनके खिलाफ लगाए गए दिव्यांगता प्रमाण पत्र से जुड़े आरोपों में उन्हें मऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) से क्लीन चिट मिल चुकी है। उन्होंने इसे अपने बचाव के तौर पर सार्वजनिक रूप से पेश किया।
लेकिन इस दावे को उस समय झटका लगा, जब **मऊ के CMO डॉ. संजय गुप्ता** ने इस पर साफ तौर पर खंडन किया। CMO ने कहा कि प्रशांत सिंह को इस मामले में किसी तरह की आधिकारिक क्लीन चिट नहीं दी गई है। इसके बाद, स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठने लगा कि आखिर प्रशांत सिंह ने क्लीन चिट मिलने का दावा किस आधार पर किया।
CMO के खंडन से बढ़ी मुश्किलें
CMO द्वारा दिए गए बयान के बाद यह मामला और गंभीर हो गया। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, किसी भी अधिकारी को क्लीन चिट तभी मानी जाती है, जब जांच पूरी होने के बाद लिखित रूप से इसकी पुष्टि की जाए। इस बीच, CMO के खंडन ने प्रशांत सिंह की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं, विपक्षी पक्ष इसे प्रशासनिक पारदर्शिता से जोड़कर देख रहा है।
यह है कारोबारी का गंभीर आरोप
इसी बीच, अयोध्या के एक स्थानीय कारोबारी ने प्रशांत सिंह पर आठ लाख रुपये की फर्जी डिमांड का आरोप लगाते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कारोबारी का कहना है कि GST से जुड़े एक मामले को निपटाने के नाम पर उससे अवैध धन की मांग की गई।
कारोबारी द्वारा दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि मांग पूरी न होने पर उसे परेशान किया गया। हालांकि, प्रशांत सिंह की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
कोर्ट तक पहुंचा मामला
कारोबारी की याचिका के बाद मामला अब न्यायिक प्रक्रिया में प्रवेश कर चुका है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि कोर्ट इस पूरे प्रकरण को किस नजरिए से देखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला न केवल एक अधिकारी की व्यक्तिगत छवि से जुड़ा होगा, बल्कि पूरे विभाग की कार्यप्रणाली पर भी असर डाल सकता है।
प्रशासनिक छवि पर पड़ रहा बड़ा असर
इस पूरे घटनाक्रम ने GST विभाग और प्रशासनिक तंत्र की छवि को भी प्रभावित किया है। आम तौर पर ऐसे मामलों में प्रशासन निष्पक्ष जांच की बात करता है, ताकि सच्चाई सामने आ सके। हालांकि, इस मामले में इस्तीफा, उसकी वापसी, क्लीन चिट का दावा और फिर उसका खंडन—इन सबने स्थिति को जटिल बना दिया है।
आगे क्या हो सकता है
फिलहाल, प्रशांत सिंह के खिलाफ लगे आरोपों की जांच विभिन्न स्तरों पर की जा सकती है। एक ओर जहां दिव्यांगता प्रमाण पत्र मामले में प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट होनी बाकी है, वहीं दूसरी ओर कारोबारी द्वारा लगाए गए आरोपों पर कोर्ट की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
इसके अलावा, सरकार और संबंधित विभाग भी इस पूरे प्रकरण पर नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है कि प्रशांत सिंह के दावों में कितनी सच्चाई है और आरोप किस हद तक प्रमाणित होते हैं।
अब कोर्ट पर टिकी हैं सबकी निगाहें
कुल मिलाकर, GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत सिंह का मामला फिलहाल कई सवालों के घेरे में है। इस्तीफा वापस लेने के बाद भले ही उन्होंने राहत की सांस ली हो, लेकिन नए आरोपों और आधिकारिक खंडन ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अब सबकी नजरें प्रशासनिक जांच और कोर्ट की कार्रवाई पर टिकी हैं, जो इस पूरे विवाद की दिशा तय करेंगी।



