
बलिया: उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से एक ऐसी मार्मिक और गंभीर खबर सामने आई है, जो हमारे आधुनिक समाज की संकीर्ण सोच पर कड़ा प्रहार करती है। यहाँ के एक गांव का नाम ‘रूपवार तवायफ’ है। सुनने में यह महज एक नाम लग सकता है, लेकिन यहाँ के सैकड़ों ग्रामीणों के लिए यह शब्द एक गहरा घाव और मानसिक अभिशाप बन चुका है।
🛑 सम्मान की तलाश में अपमान का सामना
ग्रामीणों का दर्द है कि जैसे ही वे किसी बाहरी व्यक्ति या अधिकारी के सामने अपने गांव का नाम लेते हैं, सामने वाले के चेहरे के भाव बदल जाते हैं। लोग उन्हें अजीब और हीन नजरों से देखने लगते हैं। गांव के निवासियों का कहना है कि वे भी अन्य गांवों की तरह मेहनत-मजदूरी और सम्मान के साथ जीवन बसर करते हैं, लेकिन गांव का नाम उनके व्यक्तित्व पर एक नकारात्मक ठप्पा लगा देता है।
🚫 युवाओं के करियर और रिश्तों में रोड़ा
गांव के पढ़े-लिखे युवाओं के लिए यह नाम उनके भविष्य की सबसे बड़ी बाधा बन गया है। युवाओं ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया:
- नौकरी और इंटरव्यू: प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरने से लेकर इंटरव्यू तक, हर जगह उन्हें मजाक और तंज का सामना करना पड़ता है। कई बार इंटरव्यू बोर्ड के सदस्य भी गांव के नाम को लेकर असहज सवाल पूछ बैठते हैं।
- बेटियों की शादी: सबसे अधिक समस्या बेटियों के लिए है। ग्रामीणों का दावा है कि गांव के नाम के साथ जुड़े ‘तवायफ’ शब्द के कारण कई बार अच्छे रिश्ते सिर्फ इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि लोग इस नाम के साथ जुड़ना नहीं चाहते।
- सरकारी दस्तावेज: आधार कार्ड, वोटर आईडी और निवास प्रमाण पत्र जैसे जरूरी कागजात में यही नाम दर्ज है, जिसे दिखाते वक्त ग्रामीणों को गहरी शर्मिंदगी और हिचकिचाहट महसूस होती है।
🏛️ प्रशासन से गुहार: “हमें पहचान बदलनी है”
गांव के बुजुर्गों का मानना है कि यह नाम किसी पुराने ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ा हो सकता है, लेकिन आज की पीढ़ी का उससे कोई नाता नहीं है। गांव के बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर और अफसर बनने का सपना देख रहे हैं, लेकिन उन्हें डर है कि यह नाम उम्र भर उनका पीछा नहीं छोड़ेगा।
ग्रामीणों की मांग: “हमारा गुनाह क्या है? हम सिर्फ एक सम्मानजनक पहचान चाहते हैं। शासन और प्रशासन से हमारी करबद्ध प्रार्थना है कि गांव के नाम से ‘तवायफ’ शब्द हटाकर इसे कोई नया और गौरवपूर्ण नाम दिया जाए।”
💡 क्या कहता है नियम?

किसी भी गांव या क्षेत्र का नाम बदलने की प्रक्रिया राज्य सरकार के अधीन होती है। यदि ग्राम पंचायत नाम बदलने का प्रस्ताव पारित कर जिला प्रशासन को भेजती है, तो जिलाधिकारी के माध्यम से यह प्रस्ताव शासन तक पहुँचता है। ग्रामीणों ने अब एकजुट होकर इस दिशा में ठोस कदम उठाने का मन बना लिया है।
निष्कर्ष
रूपवार तवायफ गांव की यह स्थिति बताती है कि कैसे एक शब्द किसी की पूरी पहचान को धूमिल कर सकता है। क्या प्रशासन इन ग्रामीणों की पीड़ा सुनेगा? यह सवाल आज भी बलिया के गलियारों में गूँज रहा है।



