जानिए रामलला की मूर्ति निर्माण के दौरान मूर्तिकार अरुण योगीराज के अद्भुत अनुभव: तुरंत करिये एक क्लिक

रामलला की मूर्ति बनाने के दौरान मशहूर मूर्तिकार अरुण योगीराज ने जो अद्भुत अनुभव साझा किए हैं, वह न केवल कला की महिमा को दर्शाते हैं, बल्कि उनके भगवान राम के प्रति अनन्य श्रद्धा और विश्वास को भी उजागर करते हैं। अयोध्या में विराजमान रामलला की यह मूर्ति देशभर में चर्चित हो चुकी है। यह वही मूर्ति है जिसे बनाने के दौरान अरुण योगीराज को कई रहस्यमयी अनुभवों का सामना करना पड़ा। मूर्तिकार ने बताया कि कैसे भगवान राम ने खुद उनसे यह कार्य करवाया और कैसे मूर्ति की आभा गर्भगृह में प्रवेश करते ही बदल गई।
योगीराज ने इस तरह बताई प्रभु की लीला
अरुण योगीराज का कहना है कि यह कार्य उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं किया, बल्कि यह भगवान राम का आदेश था। वह बताते हैं कि जब वह रामलला की मूर्ति का निर्माण कर रहे थे, तो रोज़ उन मूर्तियों से बात करते थे। हर दिन, वह भगवान से कहते थे, “प्रभु, मुझे दूसरों से पहले दर्शन दे दो,” और यह वही समय था जब वह महसूस करते थे कि भगवान खुद उनकी मदद कर रहे हैं।
योगीराज के मुताबिक, जब मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हुई और वह गर्भगृह में प्रवेश किए, तो वह पहचान नहीं पाए कि यह वही मूर्ति है जो उन्होंने बनाई थी। मूर्ति की आभा, उसके हाव-भाव, सब कुछ बदल चुका था। उनके अनुसार, गर्भगृह में जाने के बाद मूर्ति में एक अलग ही ऊर्जा महसूस हुई। उन्होंने कहा, “मैं अंदर जाता और उस मूर्ति को देखता, मुझे लगता कि यह मेरी बनाई हुई नहीं हो सकती।”
क्या कहता है अनुभव
इस अनुभव को याद करते हुए, योगीराज ने बताया कि उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उन्होंने इतनी प्रभावशाली मूर्ति बनाई थी। उनका मानना था कि अगर वह फिर से प्रयास भी करें, तो वह कभी भी ऐसी मूर्ति नहीं बना सकते। “जब मैंने मूर्ति बनाई थी तो वह अलग थी, लेकिन जब वह गर्भगृह में गई और प्राण-प्रतिष्ठा हुई, तो वह पूरी तरह से बदल गई।” उन्होंने बताया कि उन्होंने 10 दिन तक गर्भगृह में समय बिताया और उस दौरान उन्हें कई अद्भुत अनुभव हुए।
अरुण योगीराज ने यह भी बताया कि जब वह मूर्ति की निर्माण प्रक्रिया में लगे हुए थे, तो भगवान राम ने उन्हें कई बार रहस्यमयी संकेत दिए। एक बार दीपावली के समय, उन्हें 400 साल पुरानी कुछ तस्वीरें मिलीं, जो मूर्ति के निर्माण के लिए उपयोगी साबित हुईं। इसके अलावा, उन्होंने यह भी साझा किया कि हनुमानजी स्वयं उनके दरवाजे पर आते थे। वह कहते थे, “हर शाम 4 से 5 बजे के बीच, एक बंदर हमारे दरवाजे के पास आता था, सब कुछ देखता और फिर चला जाता था।” योगीराज के अनुसार, यह अनुभव भगवान राम और उनके अनुयायी हनुमानजी के आशीर्वाद का प्रतीक था।
योगीराज ने यह भी बताया कि मूर्ति निर्माण के दौरान उनके असिस्टेंट्स के जाने के बाद वह अकेले भगवान के पास बैठकर प्रार्थना करते थे कि “प्रभु, मुझे दूसरों से पहले दर्शन दे दो।” इस दौरान उन्हें महसूस हुआ कि भगवान राम ने ही इस पूरी प्रक्रिया में उनकी मदद की।
मूर्ति निर्माण के साथ जुड़ा एक और दिलचस्प तथ्य यह था कि रामलला की मूर्ति की ऊँचाई 51 इंच रखी गई थी। वैज्ञानिक गणित के अनुसार, इस आकार की मूर्ति पर राम नवमी के दिन सूर्य की किरणें भगवान राम के मस्तक पर सीधी पड़ेंगी। योगीराज के अनुसार, यह विशेष गणना ही उन्हें एक सही दिशा में मार्गदर्शन करने वाली थी।
अरुण योगीराज का मानना है कि भगवान राम का आशीर्वाद उनके साथ था, जिसने उनकी कला को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने स्वीकार किया कि इस कार्य के बाद उन्हें नींद की परेशानी हो रही थी, क्योंकि उनकी आत्मा पूरी तरह से इस अद्भुत अनुभव में डूब चुकी थी। योगीराज ने इस अद्भुत कार्य के लिए खुद को श्रेय नहीं दिया। उनका कहना था, “यह कार्य मैंने खुद नहीं किया, भगवान राम ने मुझसे करवाया है।”
पूरे विश्व को मिल रहा आशीर्वाद
इस मूर्ति निर्माण का अनुभव न केवल अरुण योगीराज के लिए, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। उनके अनुसार, अगर भगवान राम का आशीर्वाद नहीं होता, तो वह कभी भी ऐसी मूर्ति नहीं बना सकते थे। योगीराज ने कहा कि यह एक चमत्कार था, जिसमें भगवान ने स्वयं उनका मार्गदर्शन किया और उनकी कला को दिव्यता दी।
इस अनुभव के बाद, उन्होंने अपनी कला और श्रद्धा से जुड़े कई रहस्यमय और अद्भुत पहलुओं को साझा किया, जिनका अनुसरण कर पाना उनके लिए भी मुश्किल था। इस प्रक्रिया में, उन्होंने यह भी सीखा कि किसी भी महान कार्य को संपन्न करने के लिए भगवान की आशीर्वाद की आवश्यकता होती है, और यह आशीर्वाद न केवल मूर्तिकारों को, बल्कि हर व्यक्ति को मिलता है जो सच्चे मन से काम करता है।
इस प्रकार, अरुण योगीराज की रामलला मूर्ति केवल एक कला का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह एक दिव्य अनुभव है, जिसमें कला, श्रद्धा और भगवान का अद्भुत मेल है। यह मूर्ति न केवल भगवान राम की भव्यता का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाती है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास से कोई भी कार्य असंभव नहीं होता।



