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शंकराचार्य पद को लेकर राजनीति और आध्यात्मिक मर्यादा के बीच खींचतान, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पलटवार

उत्तर प्रदेश: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा शंकराचार्य पद को लेकर दिए गए बयान ने प्रदेश की सियासत में एक नई हलचल मचा दी है। योगी के बयान के बाद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पलटवार करते हुए इस विवाद को और गहरा कर दिया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि शंकराचार्य पद कोई राजनीति का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म और आध्यात्मिक मर्यादा से जुड़ा हुआ है।

शंकराचार्य पद का महत्व का दिया जाने लगा हवाला 

शंकराचार्य की पदवी, जिसे आदि गुरु शंकराचार्य ने स्थापित किया था, हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पदों में से एक मानी जाती है। यह पद धार्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान के मामलों में गहरी समझ और मर्यादा का प्रतीक होता है। शंकराचार्य का कार्य केवल धार्मिक उपदेश देना नहीं, बल्कि समाज में सनातन धर्म के मूल्यों की रक्षा करना भी है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस संदर्भ में कहा, “शंकराचार्य पद राजनीति का हिस्सा नहीं है, यह सनातन धर्म की मर्यादा का प्रतीक है। इसे किसी दल या व्यक्ति की इच्छाओं से तय नहीं किया जा सकता। यह एक सम्मानजनक और ऐतिहासिक पद है, जिसे केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से स्वीकार किया जा सकता है।”

पढ़िए योगी का बयान और विवाद

दरअसल, हाल ही में योगी आदित्यनाथ ने एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि शंकराचार्य पद पर कोई भी व्यक्ति आ सकता है, यह सिर्फ आधिकारिक नियुक्ति का मामला है। उनके इस बयान ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि शंकराचार्य का चयन राजनीति से परे होता है, लेकिन उसके बाद भी इस पद को लेकर विवाद बढ़ गया।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, “शंकराचार्य पद को किसी राजनीतिक दल के हिसाब से तय नहीं किया जा सकता। यह एक आध्यात्मिक पद है, जिसमें किसी पार्टी या दल का कोई योगदान नहीं होता। शंकराचार्य पद का चयन केवल धार्मिक परंपराओं, संस्कृतियों और शास्त्रों के आधार पर किया जाना चाहिए।”

सियासी संग्राम: भाजपा, सपा और संतों के बीच जुबानी तीर

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का यह बयान सीएम योगी के बयान के बाद एक तरह से सियासी संग्राम का रूप ले चुका है। समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) के बीच शब्दों की जंग जारी है, जबकि संतों और धार्मिक गुरुओं का भी इस विवाद में हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है।

इस संदर्भ में, सपा ने योगी आदित्यनाथ के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि वह इस धार्मिक मुद्दे को राजनीति का हिस्सा बना रहे हैं। वहीं, भाजपा ने इसे पूरी तरह से गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया।

इसके अलावा, इस मुद्दे पर संत समाज भी अपने विचार व्यक्त कर रहा है। कई संतों ने इस मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप की आलोचना की है और यह स्पष्ट किया है कि शंकराचार्य पद का चुनाव आध्यात्मिक मर्यादाओं के तहत ही होना चाहिए।

दिया जा रहा है शास्त्रों का हवाला

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा कि शंकराचार्य का पद राजनीति से परे है और इसे धार्मिक परंपराओं के अनुसार ही तय किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म में कोई भी निर्णय धार्मिक शास्त्रों के आधार पर लिया जाता है, न कि राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर।

उन्होंने यह साफ किया कि शंकराचार्य पद पर बैठने के लिए केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण और धार्मिक सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए। शंकराचार्य पद का चयन समाज और धर्म के हित में किया जाता है, न कि राजनीतिक लाभ के लिए।

धर्म और राजनीति का मेल

यह विवाद धर्म और राजनीति के बीच बढ़ती कड़ी तकरार को उजागर करता है। जिस तरह से धार्मिक मुद्दों को सियासी एजेंडे से जोड़कर देखा जा रहा है, वह समाज के विभिन्न वर्गों में असहमति का कारण बन सकता है। संतों और धार्मिक नेताओं ने बार-बार यह चेतावनी दी है कि धर्म और राजनीति का मिश्रण नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे समाज में दुराग्रह और असहमति का माहौल बन सकता है।

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