बिल्हौर के जैसरमऊ वेटलैंड को मिलेगी नई पहचान, ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन वेटलैंड’ योजना के तहत होगा विकास

कानपुर: जिले के बिल्हौर क्षेत्र स्थित जैसरमऊ वेटलैंड अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन के नए केंद्र के रूप में पहचान बनाने जा रहा है। प्रदेश सरकार की ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन वेटलैंड’ योजना के तहत जैसरमऊ वेटलैंड का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, जिसके अंतर्गत इसे संरक्षित और नियंत्रित विकास के साथ विकसित किया जाएगा। यह वेटलैंड गंगा की कटरी में स्थित है और इसकी जैव-विविधता को देखते हुए इसे भविष्य में एक प्रमुख पर्यावरणीय स्थल बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
जैसरमऊ वेटलैंड, जो 6 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है, गंगा नदी के बाढ़ के पानी से भरता है और यह क्षेत्र कई पक्षी और जलीय जीवों का घर है। अब, इसे संरक्षित करने और इसके प्राकृतिक संसाधनों का सही तरीके से उपयोग करने के लिए अधिकारियों द्वारा कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं।
वन डिस्ट्रिक्ट वन वेटलैंड योजना का महत्व
‘वन डिस्ट्रिक्ट वन वेटलैंड’ योजना के तहत प्रत्येक जिले में एक वेटलैंड को चुना जाएगा, जिसे संरक्षण और विकास के उद्देश्य से बढ़ावा दिया जाएगा। जैसरमऊ वेटलैंड का प्रस्ताव इस योजना के तहत शासन को भेजा गया है, ताकि इसे विशेष रूप से संरक्षित किया जा सके और इसके इकोलॉजिकल महत्व को बढ़ाया जा सके।
वेटलैंडों का संरक्षण जलवायु परिवर्तन से निपटने, बाढ़ नियंत्रण और जलस्तर को बनाए रखने में मदद करता है। साथ ही, ये क्षेत्र जैविक विविधता के लिए भी महत्वपूर्ण होते हैं, जहां विभिन्न प्रजातियां अपना जीवन यापन करती हैं। जैसरमऊ वेटलैंड में अब तक लगभग 150 पक्षी और तितलियों की प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है, जिससे इसका पर्यावरणीय महत्व और भी बढ़ जाता है।
जैसरमऊ वेटलैंड की जैविक विविधता और संरक्षण
जैसरमऊ वेटलैंड में पक्षियों की करीब 150 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें लिटिल कार्मोरेंट, भारतीय मोर, ब्रोंज-विंग्ड जेकाना, पर्पल हेरॉन, ग्रेट एगरेट, और ब्लैक-विंग्ड स्टिल्ट जैसी प्रजातियां शामिल हैं। इसके अलावा, नीलगाय और गोल्डन सियार जैसे स्तनधारी भी इस क्षेत्र में देखे जाते हैं। तितलियों की प्रजातियों में पीकॉक पैंसी और प्लेन टाइगर विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र हैं।
यह वेटलैंड क्षेत्र ना सिर्फ पक्षियों और जानवरों का सुरक्षित आवास है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में भी मददगार है। पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए इस तरह के वेटलैंड का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विकास कार्य और संरक्षित क्षेत्रों की योजना
जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह और प्रभागीय वन अधिकारी दिव्या ने जैसरमऊ वेटलैंड का निरीक्षण किया और इसके विकास के लिए कई दिशा-निर्देश दिए। निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने वेटलैंड की ड्रोन मैपिंग कराने के आदेश दिए, जिससे इसके सीमांकन को स्पष्ट किया जा सके और आसपास की भूमि को अतिक्रमण से बचाया जा सके।
वेटलैंड के विकास के लिए क्रिटिकल गैप फंड से बर्ड टॉवर और वॉच टॉवर बनाए जाएंगे। साथ ही, पाथ-वे तैयार कर इसे बर्ड वॉचिंग और नेचर ट्रेल के रूप में विकसित करने की योजना है। इस तरह के सुविधाओं के निर्माण से जैसरमऊ वेटलैंड पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा, जिससे इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलेगा।
गंगेश्वर आश्रम और धार्मिक पर्यटन
जैसरमऊ वेटलैंड के पास स्थित गंगेश्वर आश्रम का भी महत्व है, जहां महाशिवरात्रि के मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। जिलाधिकारी ने आश्रम परिसर में पौधारोपण भी किया, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। इस आश्रम के पास स्थित वेटलैंड को धार्मिक और प्रकृति पर्यटन का केंद्र बनाने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।
सामुदायिक सहभागिता और रोजगार के अवसर
जिलाधिकारी ने कहा कि जैसरमऊ वेटलैंड का विकास केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय समुदाय को भी इसमें शामिल किया जाएगा। स्थानीय युवाओं को पर्यावरण संरक्षण गतिविधियों से जोड़ा जाएगा और इको-टूरिज्म आधारित रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएंगे। इससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा।
वेटलैंड का संरक्षण क्यों है जरूरी?
वेटलैंड वे क्षेत्र होते हैं जो लंबे समय तक जलमग्न रहते हैं या जिनकी मिट्टी में नमी बनी रहती है। ये जल स्रोतों को शुद्ध करने, भूजल को रिचार्ज करने और बाढ़ के समय अतिरिक्त पानी को रोकने में मदद करते हैं। साथ ही, यह पक्षियों, मछलियों और अन्य जलजीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं। पर्यावरण संतुलन और जैव-विविधता संरक्षण के दृष्टिकोण से वेटलैंड का संरक्षण बेहद महत्वपूर्ण है।



