पढ़िए श्रीराम के आगमन की कथा: शरभंग की तपस्या और राक्षसी अत्याचारों का दिखा था प्रतिशोध

भारतवर्ष की प्राचीन कथाएँ हमें न केवल इतिहास और संस्कृति से अवगत कराती हैं, बल्कि जीवन के गहरे पहलुओं को भी उजागर करती हैं। रामायण, भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न हिस्सा, न केवल एक महाकाव्य है, बल्कि यह हमें सत्य, धर्म, और न्याय के महत्व को भी समझाता है। इस महाकाव्य में श्रीराम के आगमन की कहानी एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है, जहाँ राक्षसी अत्याचारों के खिलाफ युद्ध की शुरुआत होती है। यह कथा विशेष रूप से महर्षि शरभंग की तपस्या और उनकी पीड़ा से जुड़ी हुई है, जो राम के आगमन से जुड़ी एक गहरी प्रेरणा की कहानी प्रस्तुत करती है।
महर्षि शरभंग का तप और त्याग
शरभंग, एक महान तपस्वी, जिन्होंने अपने जीवन को साधना और तपस्या में समर्पित किया था, जब राक्षसों के अत्याचारों से त्रस्त हुए, तो उन्होंने शरणार्थियों की तरह दिन रात तपस्या की। यह वह समय था जब लंका के राक्षसों ने पूरे वन क्षेत्र में आतंक मचा रखा था। राक्षसी साम्राज्य ने ना केवल ऋषियों के आश्रमों को नष्ट किया, बल्कि भील समुदायों की बस्तियों में आग लगा दी, उनकी संपत्तियों छीन ली और उनके जीवन को नर्क बना दिया।
शरभंग ने इन अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने का निर्णय लिया। एक दिन, जब वह देख रहे थे कि राक्षसों ने उनके साथियों की हत्या की और उनका माँस खा लिया, तो उनके मन में गहरा विषाद और क्रोध उत्पन्न हुआ। वह अपने साथियों की अस्थियाँ एकत्रित करते हुए, आकाश की ओर हाथ उठाकर भगवान से पुकारे- “हे ईश्वर, क्या यही हमारी तपस्या का फल है?” उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि क्या भगवान कभी इस पीड़ा को समाप्त करेंगे?
शरभंग की पीड़ा और राम का आगमन
समय बीतता गया, लेकिन भगवान राम का आगमन अभी तक नहीं हुआ। महर्षि शरभंग की तपस्या दिन-प्रतिदिन और कठोर होती गई, और उनका विश्वास था कि भगवान राम आएंगे और राक्षसों का संहार करेंगे। युगों बाद, जब भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वन में भ्रमण कर रहे थे, तब शरभंग ने उन्हें देखा। वह एक वृद्ध तपस्वी थे, लेकिन उनकी आँखों में उसी श्रद्धा और विश्वास की चमक थी जो उन्होंने पहले दिन से अपने प्रभु के लिए समर्पित किया था।
शरभंग ने राम से कहा, “अब मैं चलता हूँ, राम। मैं तो तुम्हारा दर्शन करने के लिए ही रुका था। लेकिन जब तुम मेरी अंत्येष्टि देखोगे, तो समझोगे कि राक्षसी अत्याचारों के खिलाफ इस तपस्वी ने कितनी पीड़ा झेली है।” राम ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन शरभंग नहीं रुके। उन्होंने कहा, “मेरी मृत्यु तुम्हें हमारी पीड़ा का स्मरण कराएगी। यह तुम्हारे लिए एक सबक होगा कि तुम्हे न्याय करना होगा।”
शरभंग ने आत्मदाह कर लिया और उनकी मृत्यु ने राम को गहरे शोक और क्रोध में डुबो दिया। राम का हृदय जल उठा, और उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक राक्षसों का संहार नहीं कर देंगे, वह शांत नहीं बैठेंगे।
श्रीराम का संकल्प: राक्षसों का नाश
राम का यह संकल्प उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उन्होंने कहा, “मैं दाशरथि राम हूँ, और जब तक संसार से सभी राक्षसों का नाश नहीं हो जाता, तब तक मैं शांति से नहीं बैठूंगा।” शरभंग की तपस्या और बलिदान ने राम को वह शक्ति और प्रेरणा दी, जिसके कारण वह राक्षसों के खिलाफ संघर्ष में जुट गए।
राम के इस संकल्प के बाद, उन्होंने लंका के राक्षसों के खिलाफ युद्ध छेड़ा, और रावण जैसे दुष्ट का संहार किया। यह युद्ध केवल एक भौतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह उस समय की सबसे बड़ी मानवीय पीड़ा और अन्याय के खिलाफ खड़ा होने की प्रतीक बन गया। राम ने शरभंग की तपस्या का सम्मान किया और राक्षसों का संहार कर दिया, जिससे वह अपने वचन को निभा सके।



