Dharmik Morning: जरूर पढ़िए यमराज की मृत्यु और पुनर्जन्म की पौराणिक कथा: तुरंत करिये सिर्फ एक क्लिक

Dharmik Morning: हिंदू धर्मग्रंथों में यमराज को मृत्यु के देवता के रूप में जाना जाता है। वेद, पुराण और उपनिषदों में यमराज का उल्लेख धर्म, न्याय और कर्मफल के निर्णायक के रूप में मिलता है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठता है कि जो स्वयं मृत्यु के देवता हैं, उनकी मृत्यु कैसे संभव हो सकती है? यह प्रश्न भले ही प्रथम दृष्टया हास्यप्रद लगे, लेकिन पौराणिक ग्रंथों में इससे जुड़ी एक अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद कथा वर्णित है।
सबसे पहले पढ़िए सम्पूर्ण परिचय
सबसे पहले यमराज के स्वरूप और उनके परिचय को समझना आवश्यक है। यमराज सूर्य देव के पुत्र माने जाते हैं और उनकी जुड़वां बहन यमुना हैं। यमराज को यम, धर्मराज, काल, वैवस्वत और अंतक जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। वे भैंसे की सवारी करते हैं और उनके हाथ में दंड तथा पाश रहता है, जिसके माध्यम से वे जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्याय प्रदान करते हैं।
आगे जानिए
अब इस पौराणिक कथा की ओर बढ़ते हैं। बहुत समय पहले गोदावरी नदी के तट पर श्वेत मुनि नामक एक महान तपस्वी रहते थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और आजीवन शिव भक्ति में लीन रहते थे। जब उनके जीवन की आयु पूर्ण होने लगी, तब यमराज ने अपने दूत, जिन्हें मृत्यु पाश कहा गया है, को उनके प्राण हरने के लिए भेजा।
हालांकि, श्वेत मुनि अभी पृथ्वी पर अपना जीवन समाप्त नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने महामृत्युंजय मंत्र का जाप प्रारंभ कर दिया। इसी बीच, जब मृत्यु पाश उनके आश्रम के निकट पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि आश्रम की रक्षा स्वयं भैरव बाबा कर रहे हैं। भैरव, जो भगवान शिव के उग्र स्वरूप माने जाते हैं, किसी भी अन्याय को सहन नहीं करते।
जैसे ही मृत्यु पाश ने अपने कर्तव्य का पालन करने का प्रयास किया, भैरव बाबा ने उन्हें रोक दिया। धर्म और दायित्व के टकराव में भैरव ने प्रहार किया, जिससे मृत्यु पाश मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े और उनका अंत हो गया। यह समाचार जब यमराज तक पहुँचा, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे।
देवों के देव महादेव ने सुनी थी भक्त की पुकार
इसके पश्चात यमराज स्वयं श्वेत मुनि के आश्रम पहुँचे। उन्होंने पहले भैरव बाबा को मृत्युपाश में बांधा और फिर श्वेत मुनि के प्राण हरने का प्रयास किया। लेकिन उसी क्षण श्वेत मुनि ने अपने आराध्य भगवान शिव को पुकारा। भक्त की पुकार सुनकर भगवान शिव ने तुरंत अपने पुत्र कार्तिकेय को सहायता के लिए भेजा।
कार्तिकेय के आगमन के बाद यमराज और कार्तिकेय के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः कार्तिकेय के प्रहार से यमराज भूमि पर गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गई। यह घटना समस्त देवताओं के लिए चिंताजनक बन गई। जब सूर्य देव को अपने पुत्र यमराज की मृत्यु का समाचार मिला, तो वे अत्यंत व्यथित हो गए।
भगवान विष्णु ने दिया था यह सुझाव
सूर्य देव ने ध्यान द्वारा यह जाना कि यमराज ने भगवान शिव की इच्छा के विरुद्ध जाकर एक महान शिव भक्त के प्राण हरने का प्रयास किया था। इसी कारण उन्हें यह दंड मिला। समस्या के समाधान हेतु सूर्य देव भगवान विष्णु के पास पहुँचे। भगवान विष्णु ने उन्हें भगवान शिव की तपस्या करने का सुझाव दिया।
इसके बाद सूर्य देव ने कठोर तपस्या की, जिससे भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए। सूर्य देव ने विनम्रतापूर्वक यमराज को पुनर्जीवित करने का वरदान माँगा, क्योंकि उनकी अनुपस्थिति में पृथ्वी पर धर्म और न्याय का संतुलन बिगड़ गया था।
अब जानिए इस तरह से हुआ था यमराज का पुनर्जन्म
भगवान शिव ने नंदी को यमुना नदी का जल लाने का आदेश दिया। उस पवित्र जल को यमराज के पार्थिव शरीर पर छिड़कते ही वे पुनः जीवित हो गए। इस प्रकार, यमराज का पुनर्जन्म हुआ और ब्रह्मांड में धर्म एवं न्याय का संतुलन पुनः स्थापित हुआ।
यह पौराणिक कथा हमें यह सिखाती है कि देवता भी धर्म और मर्यादा के बंधन में बंधे होते हैं। साथ ही, सच्ची भक्ति और ईश्वर की कृपा से असंभव भी संभव हो सकता है।



