हनुमान जी की अद्भुत लीला: पढ़िए काकभुशुण्डि जी की कथा और श्रीराम के अवतार की शक्ति

हनुमान जी, जिन्हें पवनपुत्र और राम के परम भक्त के रूप में जाना जाता है, उनके जीवन की कई अद्भुत और चमत्कारी घटनाएँ हमें उनके महान कार्यों और भगवान श्रीराम के प्रति उनकी निष्ठा की गहरी समझ देती हैं। श्रीराम के युग में हनुमान जी ने कई असाधारण कार्य किए, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक बार उन्होंने अपनी शक्ति और भक्ति से जुड़ी एक अनोखी घटना के माध्यम से अपने भक्तों को यह समझाया कि उनका कार्य और शक्ति सिर्फ उनके नहीं, बल्कि श्रीराम की ही दिव्य शक्ति का परिणाम है? यह घटना श्री काकभुशुण्डि जी की कथा से जुड़ी है, जो उनके जीवन की अद्भुत लीला का एक हिस्सा है।
पढ़िए काकभुशुण्डि जी की कथा
श्री राम जी के साथ हनुमान जी की अद्भुत निष्ठा और कार्यों की चर्चा करने के लिए काकभुशुण्डि जी नीलगिरी पर्वत पर नियमित रूप से कथा करते थे। काकभुशुण्डि जी न केवल एक उच्च कोटि के महात्मा थे, बल्कि उनके प्रवचन से देवता, शंकर जी, और सभी प्रमुख तीर्थ स्थल के लोग भी लाभान्वित होते थे। एक दिन जब हनुमान जी ने उनकी कथा सुनी, तो उन्होंने अपने अनुभव से यह सोचा कि काकभुशुण्डि जी के कथानक में कुछ विशेष था, क्योंकि कथा में समुद्र लांघने और लंका दहन की घटनाएँ बहुत भव्य तरीके से प्रस्तुत की गई थीं।
हनुमान जी का संदेह
हनुमान जी ने सोचा कि इस प्रकार की घटनाएं उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं की थीं। काकभुशुण्डि जी के अनुसार, हनुमान जी ने एक ही बार में समुद्र लांघा और लंका को अपनी पूंछ से जला दिया। हनुमान जी ने रघुनाथ जी से इस विषय पर चर्चा की, और रघुनाथ जी ने उन्हें यह समझाया कि काकभुशुण्डि जी कोई सामान्य महात्मा नहीं हैं। वे भगवान के दिव्य कार्यों को समझते हुए कथा कहते हैं और उनका कथानक किसी एक विशेष कल्प के अनुसार होता है।
प्रभु श्रीराम का संकेत
हनुमान जी के मन में संदेह बना ही रहा, तब भगवान श्रीराम ने एक अद्भुत लीला की। उन्होंने अपनी अंगूठी गिरा दी और हनुमान जी से कहा कि वह अंगूठी को लेकर आएं। हनुमान जी जब अंगूठी उठाने के लिए झुके, तो वह अंगूठी और आगे सरक गई। हनुमान जी ने उसे बार-बार पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वह अंगूठी अंततः ब्रह्मांड का चक्कर लगा कर सुमेरु पर्वत की गुफा में समा गई।
गुफा में हनुमान जी से इस तरह हुई भेंट
हनुमान जी जब गुफा में गए तो उन्हें एक विशाल वानर ने रोका। इस वानर ने हनुमान जी से कहा कि वे भीतर जाने से पहले उससे अनुमति लें। हनुमान जी ने उसे बताया कि वह श्रीराम के भक्त हैं और पवनपुत्र हनुमान हैं। यह सुनकर वह वानर हंसी में बोला, “तुम हनुमान जी कैसे हो सकते हो? हनुमान जी तो यहां ध्यान में बैठे हैं।”
हनुमान जी समझ गए कि यह किसी विशेष लीला का हिस्सा है। उन्होंने विनम्रता से कहा कि द्वारपाल को भीतर जाकर हनुमान जी से विनती करनी चाहिए कि बाहर एक वानर खड़ा है और दर्शन करना चाहता है। जब द्वारपाल ने यह बात कही, तो भीतर बैठा हनुमान जी मुस्कुराए और बोले कि वह सचमुच वही हनुमान हैं जिन्हें बाहर खड़ा वानर देख रहा है।
अंत में दिखी हनुमान जी की असली शक्ति
जब द्वारपाल ने हनुमान जी को भीतर लाया, तो देखा कि गुफा में एक दिव्य प्रकाश फैला हुआ था। वहां पर हनुमान जी स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान थे और उनके तेजस्वी रूप में करोड़ों सूर्य की समान चमक थी। उन्होंने हनुमान जी से कहा कि काकभुशुण्डि जी ने जो कथा सुनाई थी, वह किसी और कल्प की घटना थी। हर कल्प में भगवान श्री राम के अवतार होते हैं और वे अपने भक्तों को अलग-अलग शक्ति प्रदान करते हैं।
हनुमान जी ने कागभुशुण्डि जी की कथा के संदर्भ में यह भी बताया कि भगवान श्रीराम के हर अवतार में हनुमान जी की शक्ति अलग-अलग रूप में प्रकट होती है। कभी एक पैर से समुद्र लांघना तो कभी पूंछ से लंका दहन करना—यह सब केवल श्रीराम की दिव्य इच्छा और शक्ति का परिणाम था।



