जानें क्यों बोला जाता है “राम नाम सत्य है” का यह मंत्र अंतिम यात्रा में, और पढ़िए इसका ऐतिहासिक महत्व

“न्यूज़ डेस्क”
हम सभी ने अंतिम यात्रा के दौरान “राम नाम सत्य है” का उद्घोष सुना है। यह शब्द जीवन और मृत्यु के रहस्यों को उजागर करने वाला एक अद्भुत मंत्र है। अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर क्यों अंतिम समय में इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है। क्या यह केवल एक धार्मिक परंपरा है या इसका कोई गहरा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व है? इस लेख में हम “राम नाम सत्य है” के इस रहस्यमयी मंत्र के बारे में विस्तार से जानेंगे और इसके पीछे छिपे अद्भुत रहस्य को उजागर करेंगे।
यह होता है राम नाम सत्य है का ऐतिहासिक संदर्भ
“राम नाम सत्य है” का उद्घोष भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। यह शब्द जीवन और मृत्यु के सत्य को स्वीकार करने का प्रतीक हैं। भारतीय समाज में जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तब शव यात्रा के दौरान यह मंत्र बोला जाता है, ताकि व्यक्ति का अंतिम संस्कार शांति और श्रद्धा के साथ किया जा सके। यह मंत्र यह प्रमाणित करता है कि केवल भगवान का नाम ही सच्चा और शाश्वत है, बाकी सब नश्वर और नष्ट होने वाला है।
यह है गोस्वामी तुलसीदास जी से जुड़ी प्रसिद्ध कथा
इस मंत्र की उत्पत्ति से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा गोस्वामी तुलसीदास जी से जुड़ी हुई है। तुलसीदास जी के जीवन की यह घटना न केवल एक आस्था की कहानी है, बल्कि यह हमें भक्ति, सत्य, और भगवान के प्रति अडिग विश्वास का संदेश भी देती है।

कथा के अनुसार, जब गोस्वामी तुलसीदास जी अपने गाँव में रहते थे, तब वे भगवान राम की भक्ति में पूर्ण रूप से लीन रहते थे। उनकी भक्ति के कारण कुछ लोगों ने उन्हें ढोंगी कहकर गाँव से बाहर निकाल दिया। तुलसीदास जी गंगा तट पर जाकर ध्यान करने लगे और वहीं पर ‘रामचरितमानस’ की रचना प्रारंभ की। उसी समय उनके गाँव में एक युवक का विवाह हुआ, लेकिन दुर्भाग्यवश युवक की मृत्यु उसी रात हो गई।
जब युवक की शवयात्रा निकली, तो उसकी नवविवाहित पत्नी ने भी सती होने का निर्णय लिया और पति के शव के पीछे-पीछे चलने लगी। इस शवयात्रा का रास्ता गोस्वामी तुलसीदास जी के निवास से होकर जाता था। अचानक उस महिला की नजर तुलसीदास जी पर पड़ी, और उसने सोचा कि “एक बार इन ब्राह्मण जी को प्रणाम कर लूँ”।
कहा जाता है “अखण्ड सौभाग्यवती भवः” और उसके बाद का चमत्कार
तुलसीदास जी ने जैसे ही महिला के चरण स्पर्श किए, उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा – “अखण्ड सौभाग्यवती भवः”, जिसका अर्थ है ‘तुम हमेशा सौभाग्यशाली रहो’। यह सुनकर वहाँ खड़े लोग हंसी में फूट पड़े और बोले, “तुलसीदास जी! तुम तो झूठे हो, यह लड़की सती होने जा रही है, तो यह अखण्ड सौभाग्यवती कैसे हो सकती है?”

लेकिन तुलसीदास जी ने तुरंत उत्तर दिया, “हम झूठे हो सकते हैं, लेकिन हमारे राम कभी झूठे नहीं हो सकते।” इसके बाद उन्होंने उस मृत युवक के पास जाकर उसके कान में “राम नाम सत्य है” कहा।
पहली बार जैसे ही उन्होंने यह मंत्र बोला, युवक के शरीर में हलचल हुई। दूसरी बार बोलने पर कुछ और हलचल हुई और जैसे ही तीसरी बार तुलसीदास जी ने यह मंत्र बोला, युवक की मृत देह ने चेतना प्राप्त की और वह उठकर बैठ गया। यह दृश्य देखकर सभी लोग हैरान रह गए।
जानिए राम नाम सत्य है” का प्रमाण
तुलसीदास जी ने लोगों से कहा, “यह सब भगवान राम की लीला है। अगर आप लोग इस रास्ते से नहीं जाते, तो ‘राम के नाम’ के सत्य होने का प्रमाण कैसे मिलता?” इस घटना के बाद से ही यह परंपरा बन गई कि अंतिम समय में “राम नाम सत्य है” का उच्चारण किया जाए, क्योंकि केवल भगवान का नाम ही सच्चा और स्थिर है।
पढ़िए क्यों “राम नाम सत्य है”?
इस मंत्र का गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक अर्थ है। भारतीय धर्म के अनुसार, जीवन और मृत्यु दोनों ही परिवर्तनशील हैं। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है। भगवान का नाम ही जीवन की सच्चाई और परम सत्य का प्रतीक है। जब “राम नाम सत्य है” बोला जाता है, तो यह व्यक्ति के जीवन और मृत्यु के वास्तविक रूप को स्वीकार करने का संकेत होता है। यह मान्यता है कि मृत्यु के समय व्यक्ति के मुख से भगवान के नाम का उच्चारण उसके आत्मा की शांति और मुक्ति का कारण बनता है।



