जानिए क्यों है हरिद्वार हर और हरि की पावन नगरी, पढ़िए पौराणिक महिमा और बहुत कुछ

रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा
उत्तराखंड की देवभूमि में स्थित हरिद्वार भारत के प्राचीनतम और पवित्रतम तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं, धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपरा के अनुसार, हरिद्वार की पौराणिक महिमा अद्वितीय है। यही कारण है कि इसे “हर का द्वार” और “हरि का द्वार” दोनों नामों से जाना जाता है। यह स्थान भगवान शिव (हर) और भगवान विष्णु (हरि) दोनों को अत्यंत प्रिय माना गया है।

जानिए हर का द्वार और हरि का द्वार क्यों?
सबसे पहले, “हरद्वार” नाम का संबंध भगवान शिव से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि कैलाश से जुड़ी पर्वत श्रृंखलाओं का प्रारंभ हरिद्वार से होता है। इसलिए यह स्थान भगवान शिव तक पहुंचने का द्वार माना गया और “हर का द्वार” कहलाया।

वहीं दूसरी ओर, पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु के चरण सबसे पहले जिस स्थल पर पड़े, वह हरिद्वार ही था। इसके अतिरिक्त मायापुरी क्षेत्र में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के विवाह का उल्लेख भी मिलता है। इस कारण यह “हरि का द्वार” भी कहलाया। इस प्रकार, हर और हरि दोनों से जुड़ा यह स्थल भारतीय आस्था का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है।
सृष्टि के प्रारंभिक नगरों में हरिद्वार
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, पृथ्वी पर सर्वप्रथम काशी (आनंदवन) की स्थापना हुई, जिसे मुक्ति का क्षेत्र माना गया। इसके पश्चात ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र दक्ष प्रजापति को जो स्थान शासन के लिए प्रदान किया, वह हरिद्वार ही था।

कनखल क्षेत्र को प्राचीन “दक्षपुरी” के रूप में वर्णित किया गया है। यहीं राजा दक्ष का महल था और यहीं उन्होंने प्रसिद्ध यज्ञ का आयोजन किया था। इस प्रकार, काशी के बाद हरिद्वार को प्राचीन काल का महत्वपूर्ण नगर माना जाता है।
पढ़िए माता सती और दक्ष यज्ञ की कथा
हरिद्वार की पौराणिक महिमा माता सती से भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि आदिशक्ति ने राजा दक्ष के घर सती के रूप में जन्म लिया। उनका बाल्यकाल और युवावस्था यहीं व्यतीत हुई। बाद में उन्होंने तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया।

इसी क्षेत्र में दक्ष यज्ञ का आयोजन हुआ था। जब यज्ञ में भगवान शिव का अपमान हुआ, तब माता सती ने यज्ञकुंड में देह त्याग दी। इसके पश्चात भगवान शिव ने सती की देह लेकर तांडव किया। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के अनेक भाग किए, जिनमें से एक भाग हरिद्वार में गिरा। यहां मायादेवी के रूप में शक्ति पीठ की मान्यता है, जो आज भी श्रद्धा का केंद्र है।
जानिए कुंभ और अमृत की कथा
हरिद्वार को कुंभ नगरी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले अमृत कलश से अमृत की बूंदें जिन चार स्थानों पर गिरीं, उनमें हरिद्वार भी शामिल है। इसलिए यहां प्रत्येक 12 वर्ष में कुंभ मेले का आयोजन होता है।

कुंभ के अवसर पर लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने की कामना करते हैं। यह आयोजन न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
गंगा का आशीर्वाद
गंगोत्री से निकलने वाली पवित्र गंगा हरिद्वार से होकर मैदानों की ओर प्रवाहित होती है। हर की पौड़ी पर होने वाली गंगा आरती विश्वविख्यात है। प्रतिदिन सायंकाल यहां हजारों श्रद्धालु दीपदान और आरती में भाग लेते हैं।

इसके अतिरिक्त, चारधाम—गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ—की यात्रा का प्रवेश द्वार भी हरिद्वार को ही माना जाता है। परंपरानुसार, यात्री यात्रा प्रारंभ करने से पहले हरिद्वार में पूजा-अर्चना करते हैं।
मनसा देवी, चंडी देवी और अन्य हैं पवित्र स्थल
हरिद्वार में स्थित मनसा देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि सच्चे मन से प्रार्थना करने पर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसी प्रकार, नील पर्वत पर स्थित चंडी देवी मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। लोककथाओं के अनुसार, देवी चंडी ने यहां विराजमान होकर अधर्म का विनाश किया था।

भीमगोडा भी महाभारत काल से जुड़ा स्थल माना जाता है। कहा जाता है कि भीम ने यहां तप किया था। इन सभी स्थलों के कारण हरिद्वार की धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान और भी सुदृढ़ होती है।
अब जानिए देवभूमि की पहचान
ऋषि-मुनियों, अवतारों और देवी-देवताओं की तपस्थली होने के कारण हरिद्वार को देवभूमि कहा जाता है। यहां वर्षभर देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। धार्मिक अनुष्ठान, पर्व और मेलों के कारण यह शहर आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण दिखाई देता है।

इसके साथ ही, हरिद्वार आधुनिक सुविधाओं और प्राचीन परंपराओं का संतुलित संगम भी प्रस्तुत करता है। जहां एक ओर प्राचीन मंदिर और घाट हैं, वहीं दूसरी ओर तीर्थयात्रियों के लिए आधुनिक व्यवस्थाएं भी उपलब्ध हैं।
समग्र रूप से देखें तो हरिद्वार केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और इतिहास का जीवंत प्रतीक है। हर और हरि दोनों से जुड़ी मान्यताएं, कुंभ का महत्व, गंगा का पावन प्रवाह और शक्ति पीठों की उपस्थिति इसे अद्वितीय बनाती है।

इसी कारण, हरिद्वार की पौराणिक महिमा सदियों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती रही है और आगे भी करती रहेगी। यह स्थान आस्था, अध्यात्म और परंपरा का ऐसा संगम है, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करता है।



