कानपुर में बलात्कारी दारोगा की गिरफ्तारी में पुलिस की नाकामी, विभागीय मिलीभगत के आरोप

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में एक अपराधी को पकड़ने में पुलिस प्रशासन की नाकामी से शहरवासियों में गहरा आक्रोश है। कानपुर के एक दारोगा, जो एक नाबालिग लड़की के बलात्कार के मामले में आरोपी है, वह पिछले दो महीनों से फरार है। जबकि पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी के लिए कई बार कोशिशें कीं, अब तक वह पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। इस मामले में कानपुर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं, और यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि विभागीय मिलीभगत के चलते आरोपी की गिरफ्तारी में ढील दी जा रही है।
बलात्कारी दरोगा की गिरफ्तारी में हो रही देरी
कानपुर के उस दारोगा का नाम अमित मौर्य है, जिसने एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म किया था। घटना के बाद से ही वह फरार है, लेकिन पुलिस अब तक उसे पकड़ने में सफल नहीं हो पाई है। दो महीने, यानी 60 दिन बीतने के बावजूद, आरोपी दारोगा अभी तक पुलिस की पहुंच से बाहर है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि अगर पुलिस की कार्रवाई इतनी धीमी रही है, तो क्या यह विभागीय मिलीभगत का मामला है?
पुलिस की यह नाकामी कानपुर के नागरिकों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है। अपराधी के खिलाफ कार्रवाई की बजाय पुलिस विभाग के आला अफसरों की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। जिस बलात्कारी दारोगा के खिलाफ वारंट जारी हो चुका है, उसे पकड़ने में पुलिस इतनी लंबी देरी क्यों कर रही है?
कानपुर पुलिस की साख पर संकट
कानपुर पुलिस की साख पर यह घटना भारी पड़ रही है। पुलिस का उद्देश्य जनता की सुरक्षा करना और अपराधियों को सजा दिलवाना है, लेकिन इस मामले में पुलिस की नाकामी से उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। पुलिस की यह कमजोरी यह भी दिखाती है कि अपराधियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने में कानपुर पुलिस क्यों सफल नहीं हो पा रही है।
अमेरिका और यूरोपीय देशों में पुलिस विभाग के लिए सख्त मानक होते हैं, जहां अपराधी जल्द ही गिरफ्तार हो जाते हैं, लेकिन भारतीय पुलिस विभाग, खासकर कानपुर में, इस मामले में पिछड़ता हुआ नजर आ रहा है। यही वजह है कि इस मामले में पुलिस के रवैये और कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
विभागीय मिलीभगत के आरोप
अब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पुलिस विभाग में कुछ अधिकारी अमित मौर्य को बचाने का प्रयास कर रहे हैं? क्या उनके खिलाफ कोई विभागीय मिलीभगत तो नहीं हो रही है? इन सवालों ने पुलिस के भीतर एक गहरे संदेह को जन्म दिया है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अमित मौर्य के खिलाफ कई विभागीय शिकायतें पहले भी आई थीं, लेकिन वह हमेशा बच निकलने में सफल रहा। क्या यह उसकी पदवी और विभाग में उसके कुछ प्रभावशाली संपर्कों का नतीजा था?
यह घटना कानपुर पुलिस के लिए एक बड़ा सबक है, जिससे यह साबित होता है कि पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार की सख्त आवश्यकता है। अगर पुलिस खुद अपने विभाग के कर्मियों को अपराध करने से नहीं रोक सकती, तो ऐसे मामलों में आम नागरिकों की सुरक्षा की स्थिति क्या होगी?
इनामी दारोगा और गिरफ्तारी में देरी
इस बीच, कानपुर पुलिस ने अमित मौर्य के खिलाफ 25,000 रुपये का इनाम घोषित किया है, ताकि किसी भी सूरत में उसे पकड़ा जा सके। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब पुलिस को उसकी गिरफ्तारी में इतनी आसानी होनी चाहिए थी, तो अब तक उसे क्यों नहीं पकड़ा जा सका? क्या पुलिस विभाग के अंदर कोई न कोई ऐसी बात है जो इस गिरफ्तारी में रुकावट डाल रही है?
कानपुर पुलिस ने अपनी टीमों को दारोगा की तलाश में लगाया है, लेकिन अब तक कोई ठोस सफलता नहीं मिली है। नागरिकों के बीच बढ़ती असंतोष की भावना से पुलिस के लिए इस मामले की गंभीरता और बढ़ गई है। यदि जल्द ही अमित मौर्य को गिरफ्तार नहीं किया गया, तो यह पुलिस के लिए और भी मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
नाबालिग पीड़िता को कब मिलेगा इंसाफ?
इस पूरे मामले में सबसे दुखद पहलू यह है कि नाबालिग पीड़िता को अभी तक न्याय नहीं मिला है। जिस अपराधी ने उसके साथ हैवानियत की, वह अभी भी खुलेआम घूम रहा है। पीड़िता और उसके परिवार के लिए यह एक मानसिक आघात बन चुका है, और उन्हें यह उम्मीद है कि आरोपी दारोगा जल्द ही पकड़ा जाएगा, ताकि वे इंसाफ पा सकें।
इस मामले में कानपुर पुलिस की नाकामी का असर न केवल पीड़िता के परिवार पर पड़ा है, बल्कि पूरे समाज में कानून और व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। जब पुलिस ही अपने विभाग के भगोड़े को नहीं पकड़ सकती, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की क्या स्थिति होगी?



