सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद या बाबर के नाम पर धार्मिक संरचना के निर्माण की याचिका की खारिज, आखिर क्यों?

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण आदेश सुनाया, जिसमें उसने बाबर या बाबरी मस्जिद के नाम पर किसी भी धार्मिक संरचना के निर्माण या नामकरण पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई करने से इंकार करते हुए इसे निराधार करार दिया। यह निर्णय धार्मिक संरचनाओं और उनके नामकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दृष्टिकोण को दर्शाता है।
पढ़ें याचिका में क्या था?
यह याचिका एक वकील द्वारा दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि बाबर के नाम पर देश में किसी भी मस्जिद का निर्माण नहीं किया जाए और ना ही किसी अन्य धार्मिक संरचना का नाम बाबर या बाबरी मस्जिद के नाम पर रखा जाए। याचिका में यह तर्क दिया गया था कि बाबर एक विदेशी आक्रमणकारी था, और उसके नाम पर कोई धार्मिक संरचना देश में नहीं बनाई जानी चाहिए।
याचिका में यह भी कहा गया था कि बाबरी मस्जिद के साथ जुड़े विवादों को देखते हुए, बाबर के नाम पर कोई भी नया निर्माण देश में समाजिक और धार्मिक तनाव का कारण बन सकता है। याचिकाकर्ता का दावा था कि इस प्रकार के निर्माण से राष्ट्र की एकता और अखंडता को खतरा हो सकता है।
जानिए सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को सुनवाई योग्य मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला सार्वजनिक हित का नहीं है और यह याचिका कानून की भावना के खिलाफ है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि देश में धार्मिक संरचनाओं के निर्माण या उनके नामकरण को लेकर इस प्रकार के आदेश नहीं दिए जा सकते।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में अदालत का हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक कि कोई बड़ा संवैधानिक मुद्दा न हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक और सामाजिक विवादों से अलग रखने का संकेत दिया।
देश में धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भारतीय संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और विविधता की रक्षा करने के दृष्टिकोण को दर्शाता है। भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्थाओं और विश्वासों के पालन की स्वतंत्रता दी गई है, और देश में धार्मिक स्थल निर्माण पर कोई निषेधात्मक आदेश नहीं दिया जा सकता।
देश के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक स्थल या संरचनाओं के नामकरण को लेकर समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं। हालांकि, भारत में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के कारण, किसी भी प्रकार के धार्मिक विवाद को संवैधानिक तरीके से सुलझाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस प्रक्रिया को एक बार फिर से स्पष्ट करता है कि संविधान के दायरे में रहते हुए ही धार्मिक विवादों का समाधान किया जाना चाहिए।
बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़ा है पूरा मामला
यह मामला बाबरी मस्जिद विवाद से भी जुड़ा हुआ है, जो भारतीय इतिहास का एक बहुत ही चर्चित और संवेदनशील मामला रहा है। बाबरी मस्जिद, जो कि अयोध्या में स्थित थी, 1992 में एक विवादित घटना के कारण ध्वस्त कर दी गई थी। इसके बाद से इस मस्जिद के पुनर्निर्माण और अन्य संबंधित मुद्दों पर कई कानूनी और राजनीतिक विवाद सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अयोध्या मामले में अपना फैसला सुनाया था, जिसमें मुस्लिम समुदाय को 5 एकड़ भूमि प्रदान की गई थी और हिंदू समुदाय को राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि दी गई थी।
यह रही सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट का कार्य केवल कानूनी मामलों का निपटारा करना है, और कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी धार्मिक संरचना का निर्माण केवल संविधान और कानून के तहत ही किया जाए। अदालत ने इस आदेश के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि वह केवल संवैधानिक और कानूनी विवादों पर ही विचार करेगी, और इस प्रकार के विवादों को सुलझाने के लिए उचित प्लेटफॉर्म मौजूद हैं।
पढ़िए आगे की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद, अब इस प्रकार की याचिकाओं पर कोई कानूनी कार्रवाई संभव नहीं है। यह निर्णय धार्मिक मुद्दों पर देश की न्यायिक व्यवस्था का रुख भी स्पष्ट करता है, जो यह कहता है कि धार्मिक स्थल या संरचनाओं के नामकरण पर कोई निर्णय तभी लिया जा सकता है, जब उसमें संवैधानिक या कानूनी मुद्दे शामिल हों।
यह आदेश न केवल इस मामले में बल्कि भविष्य में होने वाले किसी भी समान मामले में भी मार्गदर्शन का कार्य करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि धार्मिक विवादों को अदालतों में नहीं, बल्कि समाझिक और राजनीतिक स्तर पर संवाद के माध्यम से हल किया जाना चाहिए।
महत्वपूर्ण माना जा रहा है यह फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक महत्वपूर्ण कदम है जो यह स्पष्ट करता है कि धार्मिक मुद्दों को अदालत में नहीं, बल्कि संविधान और कानून के दायरे में रहते हुए सुलझाया जा सकता है। यह निर्णय भारत के संविधान में निहित धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है और न्यायपालिका के निष्पक्ष दृष्टिकोण को सुनिश्चित करता है।



