Vrindavan: श्री बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर विवाद, सेवायतों और निवासियों ने शपथ ली – जानिए क्या?

वृंदावन: श्री बांके बिहारी मंदिर के पास प्रस्तावित कॉरिडोर परियोजना को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। हाल ही में, मंदिर से जुड़े स्थानीय निवासियों और सेवायतों ने मंदिर के चबूतरे पर हाथ उठाकर सामूहिक शपथ ली कि वे अपने पुश्तैनी मकान और मंदिरों को नहीं सौंपेंगे। इस विवाद ने प्रशासन को नई चुनौती दी है, और स्थानीय लोगों ने सरकार और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
पढ़िए क्या है विवाद?
श्री बांके बिहारी मंदिर, जो कि वृंदावन का प्रमुख धार्मिक स्थल है, एक विशाल कॉरिडोर निर्माण परियोजना का हिस्सा बनने जा रहा है। इस परियोजना के तहत, मंदिर के आसपास के इलाके में कई संरचनाओं को हटाए जाने की योजना है, जिससे मंदिर और आसपास के क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके। लेकिन, यह परियोजना स्थानीय निवासियों और सेवायतों के बीच विवाद का कारण बन गई है।

स्थानीय निवासी और सेवायतों का कहना है कि उन्हें इस परियोजना के तहत मानसिक दबाव में लिया जा रहा है, जिससे उनके पुश्तैनी घर और मंदिरों को देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इन आरोपों ने प्रशासन के लिए नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
परिजनों और सेवायतों ने ली सामूहिक शपथ
इस मुद्दे को लेकर, स्थानीय निवासियों और सेवायतों ने मंदिर के चबूतरे पर एकत्र होकर शपथ ली कि वे अपने पुश्तैनी मकान और मंदिरों को किसी भी हालत में नहीं सौंपेंगे। उन्होंने इस शपथ को लेकर एकजुटता दिखाई और प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई।
स्थानीय निवासी सोहन लाल मिश्र ने इस पर कानूनी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि कॉरिडोर निर्माण के लिए मंदिर के कोष से धन दिया जाएगा और रजिस्ट्री ठाकुर जी के नाम पर होगी। अब प्रशासन अपने नाम रजिस्ट्री कैसे करा सकता है?” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब तक जो रजिस्ट्रियां हुई हैं, वे अवैध और दबावपूर्ण हैं। मिश्र का कहना था कि प्रशासन ने उनकी ज़मीनों पर कब्जा करने के लिए दबाव डाला है, जो कानूनी रूप से गलत है।
प्रशासन पर लगाया यह आरोप
वहीं, स्थानीय महिला राधा मिश्रा ने प्रशासन पर और भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने स्थानीय निवासियों और सेवायतों को डराने-धमकाने का काम किया है और भ्रम फैलाने की कोशिश की है। मिश्रा का आरोप था कि प्रशासन जानबूझकर भीड़ का दबाव बनाकर ज़मीनों को हथियाने का प्रयास कर रहा है।

शशि पहलवान, एक अन्य स्थानीय निवासी ने भी प्रशासन के खिलाफ अपनी चिंता जताई। उन्होंने कहा, “प्रशासन जानबूझकर कृत्रिम भीड़ का दबाव दिखाता है, ताकि लोग डरे और अपनी जमीनें छोड़ दें।” शशि ने एक और सुझाव दिया कि अगर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था लागू की जाए, तो श्रद्धालुओं को कॉरिडोर के बिना भी मंदिर में सुगम दर्शन कराए जा सकते हैं। उनका कहना था कि इससे न केवल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ेगी, बल्कि विवाद भी शांत हो सकता है।
जानिए क्या हो सकता है विवाद का भविष्य
इस विवाद ने प्रशासन के सामने एक गंभीर चुनौती पेश की है। जहां एक ओर स्थानीय निवासी और सेवायत अपने अधिकारों की रक्षा के लिए खड़े हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कॉरिडोर परियोजना का कार्य सुचारू रूप से आगे बढ़े। इस पर फिलहाल कोई ठोस हल नहीं निकल सका है, लेकिन अधिकारियों ने कहा है कि मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है।
प्रशासन ने इस विवाद के समाधान के लिए विभिन्न सुझावों पर विचार किया है, जिसमें स्थानीय निवासियों से बातचीत और परियोजना को लेकर उनकी चिंताओं को समझने का प्रस्ताव भी शामिल है। हालांकि, विवाद को लेकर दोनों पक्षों के बीच समझौता होना आसान नहीं दिखता।
धर्म और विकास के बीच संतुलन
यह विवाद न केवल प्रशासन और स्थानीय निवासियों के बीच, बल्कि धर्म और विकास के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को भी उजागर करता है। जहां एक ओर सरकार का मानना है कि कॉरिडोर परियोजना से वृंदावन क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और वहां के विकास में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोग इसे अपनी जड़ों के खिलाफ एक आक्रमण मानते हैं।
ऐसी स्थिति में दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य बैठाना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे अपने पुश्तैनी घर और मंदिरों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, और प्रशासन को उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए इस विवाद का हल निकालना चाहिए।



