1993 मुंबई बम धमाके के दोषी अबू सलेम की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला – जमानत हुई रद्द

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के मुंबई बम धमाकों के दोषी अबू सलेम की जमानत याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने यह निर्णय दिया कि अबू सलेम को तत्काल राहत देने का कोई आधार नहीं है, और उसे अपनी जमानत के लिए उच्च न्यायालय का रुख करना होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि टाडा (TADA) अधिनियम के तहत उसकी सजा और आपराधिक रिकॉर्ड उसे किसी विशेष राहत या रियायत का पात्र नहीं बनाते।
1993 मुंबई बम धमाके और अबू सलेम इस अपराध से रिश्ता
1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों को भारतीय इतिहास के सबसे घातक आतंकवादी हमलों में से एक माना जाता है। इस हमले में 250 से अधिक लोग मारे गए थे और हजारों लोग घायल हुए थे। इस कांड का मुख्य आरोपी और कथित साजिशकर्ता अबू सलेम था, जो दुबई में बसे आतंकवादी दाऊद इब्राहीम के करीबी सहयोगी के रूप में कार्य करता था।
अबू सलेम को 2002 में पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पित किया गया था, और उसने 1993 के हमलों में अपनी भूमिका को स्वीकार किया था। इसके अलावा, उसे अन्य गंभीर अपराधों में भी दोषी ठहराया गया है, जिनमें हत्या, आतंकवाद और आपराधिक साजिश शामिल हैं। अबू सलेम के खिलाफ न्यायिक कार्रवाई तब से चल रही है, और उसने कई बार जमानत के लिए अदालत का रुख किया है।
पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति ने अबू सलेम की जमानत याचिका को खारिज करते हुए कहा कि उसके खिलाफ लगे गंभीर आरोप और सजा के मद्देनजर उसे किसी प्रकार की तत्काल राहत देने का कोई कानूनी आधार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अबू सलेम की सजा और उसका आपराधिक इतिहास उसे किसी विशेष रियायत का पात्र नहीं बनाते हैं।
अदालत ने अबू सलेम को सलाह दी कि वह अपनी जमानत याचिका के लिए उच्च न्यायालय का रुख करे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मामला विशेष रूप से गंभीर अपराधों से संबंधित है और इस पर कोई तत्काल आदेश जारी करना उचित नहीं होगा।
टाडा अधिनियम और अबू सलेम का मामला
अबू सलेम को 1993 मुंबई बम धमाकों में शामिल होने के कारण टाडा (TADA) अधिनियम के तहत सजा सुनाई गई थी। टाडा एक कठोर कानून है, जो आतंकवादी गतिविधियों में शामिल आरोपियों को सजा देने के लिए बनाया गया था। यह अधिनियम उन अपराधों के लिए विशेष रूप से लागू होता है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे का कारण बनते हैं।
टाडा के तहत, अबू सलेम को गंभीर आरोपों में दोषी पाया गया था, जिनमें आतंकवाद, हत्या, और विस्फोटक पदार्थों का अवैध व्यापार शामिल हैं। अदालत ने यह भी माना कि अबू सलेम की आपराधिक गतिविधियों का इतिहास उसे किसी प्रकार की विशेष राहत के लिए योग्य नहीं बनाता।
जमानत की याचिका पर कोर्ट का रुख
अबू सलेम ने जमानत की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी, जिसमें उसने अपनी लंबी सजा और हालात का हवाला देते हुए राहत की मांग की थी। उसने यह भी तर्क दिया था कि वह पिछले कई वर्षों से जेल में बंद है और अब उसके खिलाफ कोई नया आरोप नहीं है।
हालांकि, अदालत ने यह स्वीकार किया कि अबू सलेम ने जेल में लंबा समय बिताया है, लेकिन अदालत ने उसकी जमानत याचिका को खारिज करते हुए यह भी कहा कि वह गंभीर अपराधों में लिप्त था, और उसके खिलाफ गंभीर आरोपों की वजह से उसे तत्काल राहत नहीं दी जा सकती।
इस तरह से रहा उच्च न्यायालय का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम को अपनी जमानत याचिका के लिए उच्च न्यायालय का रुख करने का निर्देश दिया। अबू सलेम के वकील ने भी यह कहा कि वे उच्च न्यायालय में मामले की फिर से सुनवाई करेंगे। उच्च न्यायालय को यह अधिकार है कि वह केस की पुनः समीक्षा कर सकता है और आरोपी को जमानत देने के मामले में अंतिम निर्णय ले सकता है।
अबू सलेम ने की थी अपील
अबू सलेम की जमानत याचिका खारिज होने के बाद, यह साफ है कि उसकी कानूनी लड़ाई अब उच्च न्यायालय में जारी रहेगी। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि उसके खिलाफ लगे आरोपों और सजा की गंभीरता को देखते हुए उच्च न्यायालय में भी उसे राहत मिलना मुश्किल हो सकता है।
इसके अलावा, यह भी स्पष्ट है कि इस मामले में राजनीति, मीडिया और सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। जब किसी आतंकवादी हमले के दोषी की जमानत पर विचार किया जाता है, तो यह मामला समाज में भी संवेदनशीलता उत्पन्न करता है।



