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IIT कानपुर की मदद से बिठूर के कुम्हार बना रहे आधुनिक मिट्टी की गुल्लक, पारंपरिक कला को नई पहचान

रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा 

कानपुर: नगर में पारंपरिक माटी कला को नई दिशा देने की एक अनूठी पहल सामने आई है। आईआईटी कानपुर के सहयोग से बिठूर के कुम्हार अब आधुनिक डिजाइन और तकनीक के साथ मिट्टी की गुल्लक तैयार कर रहे हैं। यह पहल न केवल स्थानीय कारीगरों को सशक्त बना रही है, बल्कि पारंपरिक कला को भी नए बाजार से जोड़ने का कार्य कर रही है।

जिला प्रशासन की इस पहल के बाद मिट्टी की गुल्लक अब केवल बचत का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह संस्कृति, भावनाओं और आधुनिक डिजाइन का एक सुंदर संगम बन चुकी है।

पारंपरिक कला और आधुनिक तकनीक का मिला संगम

हाल के समय में मिट्टी की गुल्लक को लेकर नई सोच विकसित की गई है। इसी क्रम में बिठूर के कुम्हारों को आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों का सहयोग मिल रहा है। इससे गुल्लक के डिजाइन, रंग और प्रस्तुति में आधुनिकता लाई जा रही है।

इसके अलावा, जिला प्रशासन ने इस परियोजना को एक सामाजिक अभियान के रूप में आगे बढ़ाया है, जिसका उद्देश्य बच्चों में बचत की आदत को बढ़ावा देना भी है।

जिलाधिकारी की पहल से शुरू हुआ अभियान

कानपुर नगर के जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि गुल्लक केवल एक मिट्टी का बर्तन नहीं है, बल्कि यह बच्चों की बचत की आदत और पारिवारिक संस्कारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि आज के समय में बढ़ते खर्चों के बीच बचत की आदत कमजोर होती जा रही है। ऐसे में बच्चों को प्रारंभ से ही आर्थिक अनुशासन सिखाने के लिए गुल्लक एक प्रभावी माध्यम हो सकती है।

इसलिए प्रशासन ने इसे केवल उत्पाद नहीं, बल्कि एक जन-जागरूकता अभियान के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है।

कारीगरों को मिल रहा है आधुनिक प्रशिक्षण

मुख्य विकास अधिकारी अभिनव जे. जैन ने बताया कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य स्थानीय कारीगरों को आधुनिक बाजार और तकनीक से जोड़ना है। इसके लिए डिजाइन, पैकेजिंग और मार्केटिंग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

इसके साथ ही, कारीगरों को नए उत्पाद विकास के लिए प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है ताकि उनकी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान मिल सके।

जानिए आईआईटी कानपुर की तकनीकी भूमिका

आईआईटी कानपुर के रंजीत सिंह रोजी शिक्षा केंद्र प्रोजेक्ट के तहत यह पहल चलाई जा रही है। इस परियोजना में तकनीकी सहयोग के माध्यम से कारीगरों को आधुनिक डिजाइन और उत्पादन तकनीक सिखाई जा रही है।

आईआईटी की परियोजना समन्वयक रीता सिंह ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य केवल उत्पाद बनाना नहीं, बल्कि पारंपरिक कला और समाज के बीच एक मजबूत सांस्कृतिक संबंध स्थापित करना भी है।

इसके अलावा, शिखा तिवारी ने बताया कि कारीगरों को बाजार की जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिससे उनके उत्पाद अधिक आकर्षक और उपयोगी बन सकें।

आधुनिक डिजाइन के साथ बदल रही गुल्लक की पहचान

सिरामिक डिजाइनर शैली संगल के मार्गदर्शन में गुल्लक के नए और आकर्षक डिजाइन तैयार किए जा रहे हैं। इनमें बच्चों की पसंद को ध्यान में रखते हुए कार्टून, पशु-पक्षी और पारंपरिक आकृतियों का समावेश किया जा रहा है।

इसके साथ ही रंग संयोजन और फिनिशिंग तकनीक पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिससे उत्पाद की गुणवत्ता और आकर्षण दोनों बढ़ सकें।

कारीगरों में बढ़ी उम्मीद और आत्मनिर्भरता

बिठूर के कुम्हार राम रतन ने बताया कि पहले मिट्टी की गुल्लकों की मांग लगातार घट रही थी, जिससे कारीगरों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।

हालांकि, अब नए डिजाइन और आधुनिक प्रस्तुति के कारण बाजार में फिर से मांग बढ़ने लगी है। इससे कारीगरों में नई उम्मीद जगी है और उनकी आजीविका को भी मजबूती मिली है।

सरकारी कार्यक्रमों में मिलेगा बढ़ावा

जिलाधिकारी ने यह भी बताया कि इन आधुनिक गुल्लकों को सरकारी कार्यक्रमों में स्मृति-चिह्न और उपहार के रूप में शामिल किया जाएगा।

इससे एक ओर स्थानीय कारीगरों को आर्थिक लाभ मिलेगा, वहीं दूसरी ओर बिठूर की माटी कला को नई पहचान और व्यापक बाजार प्राप्त होगा।

आईआईटी कानपुर और जिला प्रशासन की यह संयुक्त पहल पारंपरिक कला और आधुनिक तकनीक का एक सफल उदाहरण बन रही है। बिठूर के कुम्हारों द्वारा तैयार की जा रही आधुनिक मिट्टी की गुल्लकें न केवल सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित कर रही हैं, बल्कि स्थानीय रोजगार और आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा दे रही हैं।

आने वाले समय में यह परियोजना बिठूर की माटी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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