धर्म व ज्योतिष

भृगु ऋषि और माँ पार्वती के संवाद से स्त्रियों को सम्मान देने का मिलता है संदेश, जरूर पढ़ें

भारत की प्राचीन संस्कृति और इतिहास में ऋषियों और देवताओं से जुड़ी अनेकों कथाएँ हैं, जो हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझाने के साथ-साथ धर्म, दर्शन और नैतिकता के उच्चतम सिद्धांतों से अवगत कराती हैं। ऐसी ही एक कथा है, जिसमें भृगु ऋषि, महादेव शिव और माँ पार्वती के बीच हुए संवाद से हमें स्त्रियों के सम्मान का गहरा संदेश मिलता है। यह कथा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आज के समय में भी यह हमारे सामाजिक दृष्टिकोण को सुधारने का एक प्रयास है।

भृगु ऋषि का दृष्टिकोण और महादेव के साथ उनका विवाद

सप्तऋषियों में एक ऋषि भृगु थे, जिनकी विशेषता उनके तीव्र ज्ञान और तपस्या में थी। हालांकि, भृगु ऋषि ने कभी भी स्त्रियों को सम्मान नहीं दिया था। उनका मानना था कि स्त्रियाँ केवल पुरुषों की सेवा करने के लिए होती हैं, और वे उन्हें तुच्छ समझते थे। यही कारण था कि भृगु महादेव शिव को गुरुतुल्य मानते थे, लेकिन उन्होंने कभी माँ पार्वती को उचित सम्मान नहीं दिया। उनके इस दृष्टिकोण से शिवजी चिंतित हो गए थे, क्योंकि वे जानते थे कि स्त्री और पुरुष का संबंध जीवन के संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

एक दिन, शिवजी ने माँ पार्वती से कहा, “आज ज्ञान सभा में आप भी मेरे साथ चलिए।” माँ ने शिवजी का प्रस्ताव स्वीकार किया और वे दोनों ज्ञान सभा में पहुंचे। सभा में उपस्थित सभी ऋषिगण और देवता ने भगवान शिव और माँ पार्वती को नमन किया और उनकी प्रदक्षिणा की।

भृगु ऋषि की दुविधा और शिव-पार्वती का अर्धनारीश्वर रूप

ज्ञान सभा में जब भृगु ऋषि ने शिवजी और माँ पार्वती को एक साथ देखा, तो वे थोड़े असहज हो गए। वे समझ नहीं पा रहे थे कि वे शिवजी की प्रदक्षिणा करें या नहीं, क्योंकि उनका दृष्टिकोण स्त्रियों के प्रति बहुत नकारात्मक था। अंततः बहुत विचारने के बाद, भृगु ने महादेव से कहा, “आप दोनों को एक साथ देखना मेरे लिए कठिन है, कृपया आप पृथक खड़े हो जाएं।”

शिवजी ने भृगु के मन की बात को पहचाना और फिर माँ पार्वती को अपने आधे अंग से जुड़ने का संकेत दिया। इस प्रकार, महादेव शिव और माँ पार्वती का रूप अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट हुआ। अब शिव और पार्वती दोनों एक साथ थे, और भृगु की दुविधा और भी बढ़ गई।

भृगु का गलत दृष्टिकोण और माँ पार्वती का क्रोध

भृगु ऋषि की दुविधा का अंत नहीं हुआ। उन्होंने फिर सोचा और भवरें के रूप में शिवजी के जटाओं की परिक्रमा की। लेकिन इस पर माँ पार्वती को गहरा क्रोध आया। उन्होंने भृगु से कहा, “भृगु, तुम्हें स्त्रियों से इतना परहेज है तो मैं तुम्हारे भीतर की स्त्री शक्ति को अलग कर देती हूँ।” इसके बाद माँ ने भृगु से उसकी स्त्रीत्व शक्ति को हटा लिया।

अब भृगु न तो जीवित थे, न मृत। वह एक मध्य अवस्था में थे और असहनीय पीड़ा का अनुभव कर रहे थे। उन्हें समझ आ गया कि बिना स्त्री शक्ति के जीवन में कोई अर्थ नहीं है।

माँ पार्वती का आशीर्वाद और स्त्रियों के सम्मान का संदेश

भृगु की पीड़ा को देखकर, शिवजी ने माँ पार्वती से कहा कि भृगु को क्षमा किया जाए। माँ पार्वती ने भृगु को क्षमा किया, लेकिन उन्होंने यह भी कहा, “संसार में स्त्री शक्ति के बिना कुछ भी संभव नहीं है। बिना स्त्री के न तो पुरुष का अस्तित्व है, न प्रकृति का। दोनों का होना अनिवार्य है। जो स्त्रियों को सम्मान नहीं देता, वह जीने का अधिकारी नहीं है।”

यह कथन आज भी हमारे समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। यदि हम स्त्रियों को सम्मान नहीं देंगे, तो हम समाज के विकास और संतुलन को हानि पहुँचाएंगे। स्त्री-पुरुष दोनों का अस्तित्व एक दूसरे से जुड़ा हुआ है, और दोनों का सम्मान आवश्यक है।

समाज में स्त्रियों के सम्मान की आवश्यकता

आज भी हमारे समाज में कई लोग हैं जो स्त्रियों को तुच्छ समझते हैं और उनका अपमान करते हैं। यह विचारधारा हमें कई जगहों पर देखने को मिलती है, चाहे वह परिवार हो, कार्यस्थल हो या अन्य सामाजिक क्षेत्रों में। हमें इस सोच को बदलने की आवश्यकता है और भृगु ऋषि की गलती से प्रेरणा लेकर स्त्रियों को बराबरी का दर्जा और सम्मान देना चाहिए।

समाज का प्रत्येक सदस्य, चाहे वह पुरुष हो या महिला, को समान अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए। स्त्रियाँ न केवल घर के अंदर, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में अपना योगदान दे रही हैं, और उनके योगदान को सम्मानित किया जाना चाहिए।

इस कथा से मिलती है यह सीख 

संपूर्ण कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि स्त्री और पुरुष दोनों का सम्मान अनिवार्य है। जो समाज स्त्रियों का सम्मान नहीं करता, वह समाज अपने अस्तित्व को खतरे में डालता है। हमें भृगु ऋषि की कहानी से यह सीखने की आवश्यकता है कि न केवल स्त्रियों के अधिकारों का सम्मान करें, बल्कि उन्हें समान रूप से आदर भी दें।

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