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यौन शोषण मामले में बड़ी राहत – स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मुकुंदानंद को हाईकोर्ट से मिली जमानत

रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा 

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश की उच्च न्यायालय ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद की अग्रिम जमानत याचिका मंजूर कर उन्हें कानूनी राहत प्रदान की है। यह फैसला तब आया जब उनके खिलाफ बटुक शिष्यों के यौन शोषण से जुड़ा मामला चर्चा में था।

आशुतोष ब्रह्मचारी ने लगाया था आरोप 

मामले की पृष्ठभूमि यह है कि आशुतोष ब्रह्मचारी ने माघ मेले के दौरान आरोप लगाया था कि स्वामी और उनके शिष्य मुकुंदानंद ने बटुक शिष्यों का यौन शोषण किया। इसके बाद झूंसी थाना, प्रयागराज में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दाखिल की गई थी।

याचिका पर सुनवाई 27 फरवरी 2026 को हुई थी, जिसके बाद न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था। अब हाईकोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए दोनों आरोपियों को अग्रिम जमानत प्रदान की है। इस दौरान न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपों की जांच चल रही है और आरोपी अपनी कानूनी सुरक्षा में रहेंगे।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मुकुंदानंद की ओर से उनके वकीलों ने यह तर्क रखा कि लगाए गए आरोप फर्जी और आधारहीन हैं। उन्होंने कहा कि दोनों आरोपियों ने हमेशा समाज और धर्म के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का पालन किया है और उनका उद्देश्य केवल धार्मिक शिक्षा और सेवा है।

हाईकोर्ट ने दिया हुआ है निर्देश 

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह निर्देश दिया कि जमानत मिलने के बाद भी आरोपी जांच में सहयोग करेंगे और किसी भी तरह की बाधा नहीं डालेंगे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जमानत के बावजूद मामले की संपूर्ण कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी और सभी पक्षों को सुनवाई का अधिकार प्राप्त रहेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की अग्रिम जमानत निर्णय प्रक्रिया में न्यायिक विवेक और संतुलन का परिचायक होती है। यह सुनिश्चित करती है कि आरोपी को अनावश्यक हिरासत में रहकर मानसिक या सामाजिक क्षति न हो, जबकि मामले की जांच और न्याय प्रक्रिया पर भी कोई असर न पड़े।

इस मामले में प्रयागराज के कानूनी जानकारों ने बताया कि अग्रिम जमानत केवल कानूनी सुरक्षा और अस्थायी राहत प्रदान करती है, और यह सुनिश्चित करती है कि आरोपी जांच में उपस्थित रहें। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले से समाज में भी यह संदेश जाता है कि कानूनी प्रक्रिया निष्पक्ष और संतुलित होनी चाहिए।

इस तरह से आरोपों को बताया गया मनगढंत 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मुकुंदानंद ने मीडिया से बात करते हुए आरोपों को फर्जी और मनगढ़ंत बताया। उन्होंने कहा कि उनका जीवन हमेशा धार्मिक और सामाजिक सेवा में व्यतीत हुआ है और उन्हें उम्मीद है कि न्यायिक प्रक्रिया में सच्चाई सामने आएगी।

इस फैसले के बाद, उनके अनुयायी और समर्थक उन्हें कानूनी राहत मिलने पर संतोष व्यक्त कर रहे हैं। वहीं समाज के अन्य वर्गों ने यह भी कहा कि मामलों की जांच स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से होनी चाहिए।

अभी समाप्त भी नहीं हुआ है यह मामला 

हालांकि, यह मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उच्च न्यायालय ने केवल अग्रिम जमानत प्रदान की है, और जांच अधिकारियों को सभी सबूतों और गवाहों की समीक्षा के लिए निर्देशित किया गया है। मामले की अगली सुनवाई में दोनों पक्ष अपना पक्ष रखने के लिए उपस्थित होंगे।

इस मामले ने न केवल प्रयागराज बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में धार्मिक शिक्षा संस्थानों में सुरक्षा और निगरानी पर बहस को जन्म दिया है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में पारदर्शिता, जांच की निष्पक्षता और न्याय का पालन सबसे महत्वपूर्ण होता है।

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