
रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् (UPMSP) ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए कक्षा 9वीं से 12वीं तक केवल अधिकृत सरकारी पुस्तकों से ही पढ़ाई कराने का आदेश जारी किया है। इस फैसले का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाना और अभिभावकों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ से राहत दिलाना बताया जा रहा है।

परिषद के अनुसार, अब प्रदेश के सभी संबद्ध विद्यालयों को निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप अधिकृत पुस्तकों का ही उपयोग करना होगा। निजी प्रकाशकों की अनधिकृत या अतिरिक्त पुस्तकों को अनिवार्य रूप से लागू करने की अनुमति नहीं होगी।
जानिए निर्णय के पीछे की मंशा
पिछले कुछ वर्षों में अभिभावकों की ओर से यह शिकायतें सामने आती रही हैं कि कई निजी स्कूल निर्धारित पाठ्यक्रम के अलावा अतिरिक्त पुस्तकें खरीदने के लिए दबाव बनाते हैं। इससे अभिभावकों पर आर्थिक भार बढ़ता है।

इसी संदर्भ में, यूपी बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा को सुलभ और पारदर्शी बनाना प्राथमिकता है। इसलिए, केवल अधिकृत पुस्तकों से पढ़ाई सुनिश्चित करने का कदम उठाया गया है। परिषद का मानना है कि इससे पाठ्यक्रम की एकरूपता बनी रहेगी और विद्यार्थियों को समान शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध होगी।
पढ़िए अब क्या होगा नया नियम?
नए आदेश के अनुसार, कक्षा 9वीं से 12वीं तक सभी विषयों की पढ़ाई यूपी बोर्ड द्वारा निर्धारित और अनुमोदित पुस्तकों से ही की जाएगी। विद्यालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे छात्रों को किसी अन्य पुस्तक को अनिवार्य रूप से खरीदने के लिए बाध्य न करें।

इसके अतिरिक्त, यदि किसी विद्यालय द्वारा नियमों का उल्लंघन किया जाता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। परिषद ने संकेत दिया है कि निगरानी व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया जाएगा, ताकि आदेश का पालन सुनिश्चित हो सके।
अभिभावकों को मिलेगी राहत
इस निर्णय से अभिभावकों को आर्थिक रूप से राहत मिलने की उम्मीद है। अक्सर देखा गया है कि निजी प्रकाशकों की पुस्तकें निर्धारित पुस्तकों की तुलना में महंगी होती हैं। ऐसे में केवल सरकारी पुस्तकों को अनिवार्य करने से खर्च में कमी आ सकती है।

इसके साथ ही, यह भी माना जा रहा है कि छात्रों के बीच अध्ययन सामग्री की समानता से परीक्षा की तैयारी अधिक व्यवस्थित होगी। जब सभी छात्र एक ही पाठ्यक्रम और पुस्तक से पढ़ेंगे, तो मूल्यांकन प्रक्रिया भी अधिक संतुलित होगी।
शिक्षा व्यवस्था में बरती गई है पारदर्शिता
यूपी बोर्ड का यह कदम शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। परिषद ने स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रकार की अनियमितता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस निर्णय के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नियमित निरीक्षण और शिकायत निवारण तंत्र को भी मजबूत करना आवश्यक होगा। तभी इस नीति का अपेक्षित लाभ विद्यार्थियों और अभिभावकों तक पहुंच सकेगा।
विद्यालयों की होगी जिम्मेदारी
विद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि वे सत्र 2026-27 से पहले ही आवश्यक तैयारी कर लें। निर्धारित पुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना और छात्रों को समय पर जानकारी देना उनकी जिम्मेदारी होगी।

इसके अलावा, शिक्षकों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि पढ़ाई पूरी तरह से अधिकृत पाठ्यक्रम के अनुरूप हो। यदि किसी विषय में अतिरिक्त संदर्भ सामग्री की आवश्यकता हो, तो उसे केवल पूरक सामग्री के रूप में रखा जाए, अनिवार्य खरीद के रूप में नहीं।
सामने आ सकती हैं संभावित चुनौतियां
हालांकि यह निर्णय व्यापक रूप से स्वागत योग्य माना जा रहा है, फिर भी इसके क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां सामने आ सकती हैं। उदाहरण के लिए, पुस्तक वितरण की समयबद्ध व्यवस्था और ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।

इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण सामग्री समय पर उपलब्ध हो। यदि किसी कारणवश अधिकृत पुस्तकों की कमी होती है, तो पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। इसलिए, संबंधित विभागों को समन्वय बनाकर कार्य करना होगा।
कुल मिलाकर, यूपी बोर्ड द्वारा कक्षा 9वीं से 12वीं तक केवल अधिकृत सरकारी पुस्तकों को अनिवार्य करने का निर्णय शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे जहां अभिभावकों को आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं विद्यार्थियों को समान और मानकीकृत अध्ययन सामग्री उपलब्ध होगी।

आने वाले शैक्षणिक सत्र 2026-27 से यह नियम प्रभावी होगा। अब देखना होगा कि विद्यालय इस आदेश का किस प्रकार पालन करते हैं और परिषद किस तरह इसकी निगरानी सुनिश्चित करती है। यदि यह नीति प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है।



