धर्म व ज्योतिष

जानिए कब है अक्षय तृतीया 2026 और भगवान परशुराम जन्मोत्सव, पढ़िए व्रत कथा, दान का महत्व

रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा 

रविवार, 19 अप्रैल को देशभर में अक्षय तृतीया और भगवान परशुराम जन्मोत्सव श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। यह तिथि सनातन परंपरा में अत्यंत शुभ मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन किया गया जप, तप, दान और स्नान अक्षय फल प्रदान करता है, अर्थात उसका पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। इसी कारण इसे ‘अक्षय’ तृतीया कहा गया है।

इस वर्ष भी श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा-अर्चना करेंगे। विशेष रूप से भगवान परशुराम की जयंती होने के कारण इस तिथि का धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

पढ़िए अक्षय तृतीया की प्रचलित व्रत कथा

अक्षय तृतीया से जुड़ी कई व्रत कथाएं प्रचलित हैं। उनमें से एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में धर्मदास नामक एक वैश्य था। वह अत्यंत सदाचारी, दयालु और देव- ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धालु था। एक बार उसने अक्षय तृतीया व्रत के महात्म्य को सुना। इसके बाद जब यह पर्व आया, तो उसने प्रातःकाल पवित्र गंगा में स्नान किया और विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की।

व्रत के दिन उसने स्वर्ण, वस्त्र तथा अन्य मूल्यवान वस्तुएं ब्राह्मणों को दान में दीं। उल्लेखनीय है कि वह वृद्ध और अनेक रोगों से ग्रस्त था, फिर भी उसने उपवास रखा और पूर्ण श्रद्धा के साथ धर्म-कर्म किया। परिणामस्वरूप, अगले जन्म में वही धर्मदास कुशावती का प्रतापी और धनी राजा बना।

कहते हैं कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान और पूजन के प्रभाव से उसे अक्षय वैभव प्राप्त हुआ। इतना ही नहीं, वह इतना प्रभावशाली राजा बना कि त्रिदेव भी अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण कर उसके यज्ञ में सम्मिलित होते थे। हालांकि, अपार वैभव मिलने के बावजूद उसने कभी अहंकार नहीं किया और धर्म मार्ग से विचलित नहीं हुआ। कुछ मान्यताओं के अनुसार वही राजा आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में जन्मा।

शास्त्रों में है अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती का उल्लेख

धार्मिक ग्रंथों जैसे स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख मिलता है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को माता रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में अवतार लिया। इस प्रकार यह तिथि भगवान परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाई जाती है।

भगवान परशुराम को विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। वे जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय थे। उनका जीवन धर्म की स्थापना और अन्याय के प्रतिकार का प्रतीक माना जाता है।

परशुराम जयंती का उत्सव: विभिन्न क्षेत्रों में होंगे विशेष आयोजन

देश के विभिन्न हिस्सों में परशुराम जयंती बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है। विशेष रूप से कोंकण क्षेत्र और चिप्लून के परशुराम मंदिरों में इस अवसर पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दक्षिण भारत में भी इस तिथि को अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाता है।

इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा, हवन और धार्मिक कथा का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु भगवान परशुराम को अर्घ्य अर्पित करते हैं और उनके जीवन चरित्र का श्रवण करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन विधि पूर्वक पूजा करने से साहस, संयम और धर्मपालन की प्रेरणा मिलती है।

इस दिन गौरी-पूजा और दान का होता है विशेष महत्व

अक्षय तृतीया के दिन सौभाग्यवती महिलाएं और अविवाहित कन्याएं गौरी-पूजा करती हैं। वे माता गौरी-पार्वती की आराधना कर सुख-समृद्धि और उत्तम जीवनसाथी की कामना करती हैं। पूजा के उपरांत मिठाई, फल और भीगे हुए चने वितरित किए जाते हैं।

इसके अतिरिक्त धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल और अन्न भरकर दान करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल देता है और परिवार में समृद्धि बनाए रखता है।

अब पढ़िए परशुराम और विश्वामित्र से जुड़ी कथा

एक अन्य कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के पश्चात प्रसाद वितरण के समय ऋषि द्वारा प्रसाद बदल दिया गया। इसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय स्वभाव के बने, जबकि क्षत्रिय कुल में जन्मे विश्वामित्र आगे चलकर ब्रह्मर्षि कहलाए। यह कथा इस बात का प्रतीक है कि संस्कार और तपस्या व्यक्ति के व्यक्तित्व को आकार देते हैं।

सीता स्वयंवर और परशुराम से जुड़ा है गहरा नाता 

रामायण में उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय जब भगवान श्रीराम ने शिव धनुष भंग किया, तब परशुराम वहां पहुंचे। बाद में उन्होंने अपना धनुष-बाण श्रीराम को समर्पित कर संन्यास मार्ग अपनाया। वे अपने साथ सदैव एक फरसा रखते थे, जिसके कारण उनका नाम ‘परशुराम’ पड़ा।

इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि समय के अनुसार दायित्व परिवर्तन भी धर्म का ही अंग है।

अक्षय तृतीया का समकालीन महत्व

आज के समय में भी अक्षय तृतीया को अत्यंत शुभ माना जाता है। लोग इस दिन नए कार्यों की शुरुआत, गृह प्रवेश, विवाह और स्वर्ण खरीद जैसे शुभ कार्य करते हैं। हालांकि, धार्मिक दृष्टि से इस दिन दान, संयम और सेवा को विशेष महत्व दिया गया है।

धर्म गुरुओं का मानना है कि अक्षय तृतीया केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में परोपकार, सदाचार और संतुलित जीवन का संदेश भी देती है।

अक्षय तृतीया 2026 और भगवान परशुराम जन्मोत्सव आस्था, धर्म और दान की भावना को सुदृढ़ करने का अवसर है। यह पर्व हमें सिखाता है कि श्रद्धा, विनम्रता और सत्कर्म से जीवन में अक्षय फल प्राप्त किए जा सकते हैं। साथ ही, भगवान परशुराम का जीवन धर्म के प्रति समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देता है।

इस पावन अवसर पर सभी श्रद्धालुओं को हार्दिक शुभकामनाएं।

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