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कानपुर: महिला कांग्रेस का आरोप: OBC महिलाओं का प्रतिनिधित्व रोकना लोकतंत्र के खिलाफ कदम

रिपोर्ट – शुभम शर्मा 

कानपुर: उत्तर प्रदेश महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष करिश्मा ठाकुर ने प्रेस वार्ता कर महिला आरक्षण और ओबीसी महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर भाजपा सरकार को घेरा। कचहरी स्थित न्यू लायर्स चैंबर में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्तावित प्रावधानों के जरिए ओबीसी महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व से वंचित किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है। ऐसे में यदि किसी बड़े सामाजिक समूह की महिलाओं को प्रतिनिधित्व से बाहर रखा जाता है, तो यह लोकतांत्रिक भावना के विपरीत होगा।

अनुच्छेद 334(ए) और जाति जनगणना पर बहस

प्रेस वार्ता के दौरान करिश्मा ठाकुर ने आर्टिकल 334A of the Constitution of India में संशोधन का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार जाति जनगणना के नतीजों में देरी का हवाला दे रही है। उनके अनुसार, अन्य राज्यों ने सीमित समय में सर्वेक्षण पूरा किया है, इसलिए प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबा बताना उचित नहीं है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार और तेलंगाना में अपेक्षाकृत कम समय में व्यापक जातीय सर्वेक्षण किया गया। ऐसे में यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो आंकड़े समयबद्ध तरीके से जुटाए जा सकते हैं।

हालांकि, इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के मत भिन्न हैं। कुछ का मानना है कि व्यापक डेटा संकलन में समय लगना स्वाभाविक है, जबकि अन्य दल त्वरित प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं।

‘लोकतंत्र की भावना के अनुरूप प्रतिनिधित्व जरूरी’

करिश्मा ठाकुर ने कहा कि ओबीसी वर्ग की महिलाओं की संख्या बड़ी है और उन्हें संसद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जातीय जनगणना के आंकड़े उपलब्ध हो जाते हैं, तो उसके आधार पर आरक्षण की संरचना स्पष्ट की जा सकती है।

उन्होंने अपने बयान में कहा कि लोकतंत्र की मजबूती समावेशी प्रतिनिधित्व पर निर्भर करती है। इसलिए नीति निर्माण में सभी सामाजिक वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

73वां और 74वां संविधान संशोधन का उल्लेख

प्रेस वार्ता में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का संदर्भ देते हुए करिश्मा ठाकुर ने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए 73rd Constitutional Amendment Act और 74th Constitutional Amendment Act लाए गए थे।

इन संशोधनों के जरिए स्थानीय निकायों में महिलाओं और पिछड़े वर्गों को आरक्षण का प्रावधान मिला, जिससे जमीनी स्तर पर राजनीतिक भागीदारी बढ़ी। उन्होंने दावा किया कि वर्तमान में पंचायतों और नगर निकायों में बड़ी संख्या में महिलाएं निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रही हैं, जो लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है।

जानिए राजनीतिक बहस और विभिन्न दृष्टिकोण

महिला आरक्षण और ओबीसी महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा रहा है। एक ओर जहां कांग्रेस इस विषय पर समावेशी आरक्षण की मांग कर रही है, वहीं भाजपा का कहना है कि प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों और कानूनी ढांचे के अनुसार आगे बढ़ाई जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय पर व्यापक सहमति और स्पष्ट नीति से विवाद की स्थिति कम हो सकती है। साथ ही, जातीय आंकड़ों और प्रतिनिधित्व के स्वरूप पर स्पष्टता आने के बाद राजनीतिक दलों की रणनीति भी बदल सकती है।

प्रेस वार्ता में मौजूद रहीं कई पदाधिकारी

इस प्रेस वार्ता में मोना पासवान, ममता शाक्य, ममता परिहार, निहारिका सिंह, अधिवक्ता प्रियंका वक्त और विधिमा राजपूत सहित कई महिला अधिवक्ता और पदाधिकारी उपस्थित रहीं। सभी ने ओबीसी महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर एकजुटता जताई।

कानपुर में आयोजित प्रेस वार्ता ने एक बार फिर महिला आरक्षण और ओबीसी महिलाओं के प्रतिनिधित्व के प्रश्न को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। ओबीसी महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग को कांग्रेस ने जोरदार ढंग से उठाया है, जबकि सरकार की ओर से प्रक्रिया को संवैधानिक ढांचे के तहत आगे बढ़ाने की बात कही जा रही है।

आने वाले समय में जाति जनगणना के आंकड़े और नीति संबंधी स्पष्टता इस बहस की दिशा तय करेंगे। फिलहाल, यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

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