सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता अखिलेश दुबे को दी जमानत, न्याय में देरी नहीं होती लेकिन न्याय जरूर होता है

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में समय की देरी को मानते हुए, अधिवक्ता अखिलेश दुबे को जमानत प्रदान की है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति संजय करोल और माननीय न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे, ने दिया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि भले ही न्याय में देरी होती है, परंतु न्याय से कभी इनकार नहीं किया जा सकता।
अखिलेश दुबे पर आरोप था कि उन्होंने 50 लाख रुपये की उगाही की और इस संबंध में रवि सतीजा द्वारा वर्ष 2024 में एक एफआईआर दर्ज कराई गई थी। एफआईआर में दावा किया गया था कि अखिलेश दुबे ने अवैध रूप से पैसे की मांग की और उसे वसूलने की कोशिश की।
ये थी केस की पृष्ठभूमि
अखिलेश दुबे एक वरिष्ठ और प्रतिष्ठित अधिवक्ता हैं, जो भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। उन पर लगाए गए आरोपों ने न्यायिक समुदाय को चौंका दिया था। यह मामला बहुत ही संवेदनशील था, जिसमें एक उच्च कोटि के अधिवक्ता पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। हालांकि, उनकी ओर से आरोपों का खंडन किया गया और कहा गया कि उनके खिलाफ ये आरोप बिना किसी ठोस आधार के लगाए गए हैं।
इस मामले की सुनवाई के दौरान अखिलेश दुबे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ दवे ने अदालत में प्रभावी दलीलें प्रस्तुत की। उनके साथ अखिलेश दुबे की पुत्री और अधिवक्ता सौम्या दुबे तथा अन्य अधिवक्ता सत्यम द्विवेदी ने भी मामले में अपनी यथासंभव प्रभावशाली पैरवी की।
यह रही सुप्रीम कोर्ट का आदेश और न्याय की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता अखिलेश दुबे को जमानत देते हुए यह स्पष्ट किया कि हालांकि न्याय में कभी-कभी विलंब होता है, लेकिन न्याय का मार्ग कभी बंद नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में समय-समय पर गड़बड़ी और देरी के बावजूद अंततः सत्य और न्याय की जीत होती है।
कोर्ट ने कहा कि यह मामला विशेष रूप से एक संवेदनशील मामला था, जिसमें एक वरिष्ठ अधिवक्ता पर गंभीर आरोप थे, लेकिन यह भी देखा गया कि जमानत दी जाने से समाज में यह संदेश जाएगा कि कानून और न्याय व्यवस्था में विश्वास बनाए रखना जरूरी है।
न्याय के प्रति रहा विश्वास
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में विश्वास को और मजबूत करता है। यह उदाहरण है कि कैसे समय के साथ न्याय मिलने में कुछ देरी हो सकती है, लेकिन अंततः न्याय की प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से पूरी होती है। इस फैसले से यह भी सिद्ध हुआ कि न्याय में देरी के बावजूद किसी को भी अन्याय का शिकार नहीं होने दिया जाता।
यह मामला न्याय व्यवस्था की मजबूती को प्रदर्शित करता है, जो हर नागरिक को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। न्यायालय द्वारा दी गई जमानत से यह सिद्ध हो जाता है कि न्याय का मार्ग कभी बंद नहीं होता, भले ही उसके रास्ते में कितनी भी बाधाएं क्यों न हों।



