1995 अपहरण-हत्या मामले का आरोपी ‘सलीम वास्तिक’ कैसे बना नई पहचान, जानिए पूरा घटनाक्रम

रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा
दिल्ली: वर्ष 1995 में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुए एक अपहरण और हत्या के मामले से जुड़ा नाम हाल के दिनों में फिर चर्चा में आया है। आरोप है कि उस मामले में दोषी ठहराए गए सलीम ने सजा के बाद पैरोल पर बाहर आकर पहचान बदल ली और कई वर्षों तक अलग नाम से सक्रिय रहा। हाल में गाजियाबाद में एक घटना के बाद पुराने मामले की कड़ियां फिर से जुड़ीं।

1995: अपहरण और हत्या का मामला
20 जनवरी 1995 को दिल्ली में एक व्यापारी के 13 वर्षीय बेटे का अपहरण हुआ। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, फिरौती की मांग की गई; किंतु कथित रूप से रकम न मिलने पर अपहृत बच्चे की हत्या कर दी गई। इस घटना ने उस समय व्यापक जन चर्चा बटोरी और जांच तेज की गई।

1997: पढ़िए अदालत का फैसला
मामले की सुनवाई के बाद 1997 में दिल्ली की एक अदालत ने आरोपी सलीम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। न्यायालय के आदेश के बाद उसे कारावास भेजा गया।

2000: पैरोल और फरारी
वर्ष 2000 में सलीम पैरोल पर जेल से बाहर आया। इसके बाद वह निर्धारित अवधि में वापस जेल नहीं लौटा और फरार हो गया। पुलिस ने उसकी तलाश की, हालांकि शुरुआती वर्षों में ठोस सुराग सीमित रहे।

नई जगह, नई पहचान
फरारी के दौरान वह गाजियाबाद में आकर रहने लगा। शुरुआती समय में उसने निर्माण कार्य (कंस्ट्रक्शन) से जुड़ी गतिविधियां कीं। समय के साथ उसने धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों में सक्रियता दिखाई और स्थानीय स्तर पर पहचान बनाई।

करीब सात वर्ष पहले उसने कथित रूप से अपना नाम बदलकर “सलीम वास्तिक” रख लिया। नई पहचान के साथ वह सार्वजनिक मंचों पर दिखने लगा और सोशल मीडिया का उपयोग करने लगा।

सोशल मीडिया उपस्थिति
“Salim Vastik 007” नाम से एक यूट्यूब चैनल के माध्यम से वह सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर वीडियो साझा करता रहा। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ती उपस्थिति ने उसे एक अलग पहचान दी। हालांकि, उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार, उसके अतीत के आपराधिक मामले से जुड़ी जानकारी आम चर्चा में नहीं थी।

हालिया घटना और पुनः जांच
हाल ही में गाजियाबाद में उस पर हुए एक हमले के बाद उसका नाम फिर सुर्खियों में आया। इसी दौरान पुलिस को उसके पुराने आपराधिक मामले की जानकारी दोबारा मिली। जांच में पहचान और पृष्ठभूमि का मिलान किए जाने पर कथित तौर पर पुष्टि हुई कि ‘सलीम वास्तिक’ और 1995 के मामले का दोषी एक ही व्यक्ति हो सकता है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, संबंधित एजेंसियां कानूनी प्रक्रियाओं के अनुरूप कार्रवाई कर रही हैं। बताया गया कि स्वास्थ्य में सुधार के बाद आगे की औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी।

घटनाक्रम: सिलसिलेवार टाइमलाइन
- 20 जनवरी 1995: दिल्ली में 13 वर्षीय बालक का अपहरण।
- 1995: फिरौती न मिलने पर हत्या का मामला दर्ज।
- 1997: अदालत द्वारा दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा।
- 2000: पैरोल पर रिहाई; बाद में फरारी।
- 2000 के बाद: गाजियाबाद में निवास, पहचान छिपाकर रहना।
- आगामी वर्ष: कंस्ट्रक्शन कार्य; फिर धार्मिक-सामाजिक गतिविधियां।
- करीब 7 वर्ष पहले: नाम बदलकर “सलीम वास्तिक” रखना।
- सोशल मीडिया: “Salim Vastik 007” चैनल के जरिए सक्रियता।
- हालिया समय: गाजियाबाद में हमले के बाद पहचान की पुनः जांच।

कानूनी परिप्रेक्ष्य और आगे की प्रक्रिया
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई दोषी पैरोल शर्तों का उल्लंघन करता है और फरार रहता है, तो संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई संभव है। साथ ही पहचान बदलकर रहने के आरोपों की भी जांच की जाती है।

फिलहाल संबंधित एजेंसियां उपलब्ध दस्तावेजों, रिकॉर्ड और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया पूरी कर रही हैं। अंतिम निष्कर्ष न्यायालय और जांच एजेंसियों के आधिकारिक बयानों पर निर्भर करेगा।

करीब तीन दशक पुराने मामले से जुड़ी यह कड़ी दिखाती है कि लंबी अवधि के बाद भी कानूनी प्रक्रियाएं सक्रिय हो सकती हैं। नई पहचान, सोशल मीडिया सक्रियता और हालिया घटनाओं ने इस प्रकरण को फिर चर्चा में ला दिया है।

आगे की कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया के परिणाम पर सभी की नजरें हैं। तब तक, यह मामला कानून, पहचान और जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने रखता है।



