पढ़िए महाभारत में कितना था मामा शकुनि का प्रतिशोध: क्या सच में उसने कुरुवंश के विनाश की ली थी प्रतिज्ञा?

रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा
भारतीय महाकाव्य महाभारत केवल एक युद्ध कथा नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं, संबंधों, राजनीति और प्रतिशोध की जटिल गाथा भी है। इस महाग्रंथ में कई पात्र ऐसे हैं, जिनकी भूमिका निर्णायक रही। इन्हीं में से एक हैं शकुनि। अक्सर उन्हें कुरुक्षेत्र युद्ध का प्रमुख सूत्रधार माना जाता है। किंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या वास्तव में शकुनि ने कुरु वंश के विनाश का प्रण लिया था? और यदि लिया था, तो उसके पीछे की परिस्थितियाँ क्या थीं?

शकुनि और कुरु वंश के बीच था एक जटिल संबंध
शकुनि गांधार देश के राजकुमार थे और उनकी बहन गांधारी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार धृतराष्ट्र से हुआ था। धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन थे। अनेक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि शकुनि इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे। उनका मानना था कि उनकी बहन के साथ न्याय नहीं हुआ।

हालांकि, व्यासकृत महाभारत में इस विवाह को लेकर किसी बड़े षड्यंत्र या प्रतिशोध की स्पष्ट कथा नहीं मिलती। फिर भी, लोककथाओं और कुछ क्षेत्रीय संस्करणों में इस प्रसंग को विस्तार से बताया गया है।
क्षेत्रीय कथाओं में थी शकुनि की प्रतिज्ञा
कन्नड़ साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ विक्रमार्जुन विजया तथा जैन परंपरा के महाभारत संस्करणों में एक अलग कथा मिलती है। इन कथाओं के अनुसार, जब धृतराष्ट्र को यह ज्ञात हुआ कि गांधारी का पूर्व में ज्योतिषीय कारणों से प्रतीकात्मक विवाह एक पशु से हुआ था, तो उन्होंने इसे अपमान माना। परिणामस्वरूप, गांधार राज्य पर आक्रमण किया गया और राजा सुबल तथा उनके पुत्रों को बंदी बना लिया गया।

इन कथाओं में यह भी उल्लेख है कि बंदी बनाए गए परिवार को प्रतिदिन सीमित भोजन दिया जाता था। अंततः, पिता सुबल ने निर्णय लिया कि उनका पुत्र शकुनि जीवित रहे और शेष परिवार अपने हिस्से का अन्न उसे दे। उद्देश्य यह था कि वह जीवित रहकर कुरु वंश से प्रतिशोध ले सके।

हालांकि, यह प्रसंग मूल संस्कृत महाभारत में विस्तार से वर्णित नहीं है, फिर भी लोक मान्यताओं में यह कथा प्रचलित है और शकुनि के चरित्र को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

कर्ण की मृत्यु पर शकुनि ने जताया था शोक
व्यास कृत महाभारत के अनुसार, जब महान योद्धा कर्ण युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए, तब कई कौरव पक्ष के योद्धा शोकाकुल हुए। कुछ संस्करणों में उल्लेख मिलता है कि शकुनि भी कर्ण के शव को देखकर भावुक हुए। कर्ण दुर्योधन के लिए अंतिम और सबसे मजबूत सहारा थे।

कथाओं में यह भी कहा जाता है कि शकुनि ने कर्ण से मन ही मन क्षमा मांगी, क्योंकि उन्होंने कई बार उसका उपहास किया था या उसकी निष्ठा पर संदेह जताया था। यह प्रसंग शकुनि के व्यक्तित्व के एक मानवीय पक्ष को उजागर करता है। इससे यह संकेत मिलता है कि वह केवल षड्यंत्रकारी नहीं थे, बल्कि भावनाओं से युक्त व्यक्ति भी थे।

दुर्योधन पर प्रभाव और युद्ध की पृष्ठभूमि
शकुनि को दुर्योधन का मार्गदर्शक माना जाता है। उन्होंने दुर्योधन के मन में पांडवों के प्रति ईर्ष्या और असंतोष को दिशा दी। विशेष रूप से द्यूत क्रीड़ा का आयोजन, जिसमें युधिष्ठिर ने सब कुछ दांव पर लगा दिया, शकुनि की कूटनीति का उदाहरण माना जाता है।

हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि दुर्योधन स्वयं महत्वाकांक्षी और आक्रामक स्वभाव के थे। अतः यह कहना कि युद्ध केवल शकुनि के कारण हुआ, एकतरफा निष्कर्ष होगा। दरअसल, अनेक राजनीतिक, पारिवारिक और नैतिक कारणों ने मिलकर परिस्थितियाँ बनाई, जिनका अंत कुरुक्षेत्र युद्ध में हुआ।

जानिए क्या शकुनि को हार का पूर्व ज्ञान था?
लोक कथाओं में यह भी कहा जाता है कि शकुनि जानते थे कि कौरव पक्ष अंततः पराजित होगा। इसके बावजूद, उन्होंने युद्ध को बढ़ावा दिया ताकि उनका प्रतिशोध पूर्ण हो सके। हालांकि, यह विचार अधिकतर क्षेत्रीय और लोक संस्करणों पर आधारित है। मूल ग्रंथ में ऐसा स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि शकुनि को परिणाम का पूर्वज्ञान था।

फिर भी, यह सत्य है कि युद्ध में शकुनि स्वयं भी मारे गए। उनका अंत भी उसी संघर्ष में हुआ, जिसकी नींव रखने का आरोप उन पर लगाया जाता है।
केरल में बना है शकुनि का मंदिर
भारत के कुछ हिस्सों में शकुनि को केवल खलनायक के रूप में नहीं देखा जाता। केरल में एक मंदिर भी है, जहाँ उन्हें स्मरण किया जाता है। यह दर्शाता है कि भारतीय परंपरा में पात्रों को एकांगी दृष्टि से नहीं, बल्कि बहुआयामी रूप में देखा जाता है।

महाभारत में शकुनि का प्रतिशोध एक जटिल और बहुस्तरीय विषय है। एक ओर वे दुर्योधन के राजनीतिक सलाहकार और द्यूत क्रीड़ा के सूत्रधार के रूप में सामने आते हैं; वहीं दूसरी ओर, क्षेत्रीय कथाएँ उन्हें अपनी बहन के अपमान का बदला लेने वाला भाई भी दर्शाती हैं।

हालांकि, मूल व्यास महाभारत में कुरु वंश के विनाश की स्पष्ट प्रतिज्ञा का उल्लेख सीमित है, फिर भी लोककथाओं और क्षेत्रीय ग्रंथों ने इस कथा को व्यापक रूप दिया है। इसलिए, शकुनि का चरित्र केवल नकारात्मकता तक सीमित नहीं है। वह उस युग की राजनीतिक और पारिवारिक जटिलताओं का प्रतीक भी हैं।



