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बिजनौर: नांगल में कूड़ा प्रबंधन हुआ फेल, सरकारी नहर बनी डंपिंग साइट; जिम्मेदारी पर उठे सवाल

रिपोर्ट – ताबिश मिर्जा 

बिजनौर: जनपद के नांगल क्षेत्र में कूड़ा प्रबंधन की स्थिति चिंताजनक रूप लेती दिखाई दे रही है। सार्वजनिक कूड़ेदान की अनुपलब्धता और ठोस अपशिष्ट निस्तारण व्यवस्था के अभाव में ग्रामीणों द्वारा सरकारी नहर को ही डंपिंग साइट के रूप में उपयोग किया जा रहा है। परिणामस्वरूप नहर प्लास्टिक कचरे, खाली बोतलों और टेट्रा पैक से पट चुकी है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि समस्या नई नहीं है, बल्कि लंबे समय से बनी हुई है। हालांकि समय-समय पर शिकायतें की गईं, फिर भी अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है। ऐसे में बिजनौर नांगल कूड़ा प्रबंधन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है।

सार्वजनिक कूड़ेदान का अभाव बना मुख्य कारण

नांगल क्षेत्र के कई गांवों में सार्वजनिक कूड़ेदान की समुचित व्यवस्था नहीं है। इसके कारण लोग घरेलू कचरा खुले स्थानों या नहर में फेंकने को मजबूर हो रहे हैं। विशेष रूप से प्लास्टिक और अन्य गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरा नहर में जमा होकर जल प्रवाह को प्रभावित कर रहा है।

इसके अलावा, पंचायत स्तर पर कूड़ा एकत्रीकरण और नियमित उठान की कोई स्पष्ट व्यवस्था दिखाई नहीं देती। नतीजतन, कचरा धीरे-धीरे एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या का रूप ले रहा है।

नहर किनारे बढ़ रही गंदगी

नहर के आसपास स्थित शराब ठेकों से भी गंदगी में इजाफा हो रहा है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, शराब के खाली टेट्रा पैक, बोतलें और उपयोग किए गए प्लास्टिक गिलास सीधे नहर में फेंक दिए जाते हैं। इससे न केवल दृश्य प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि जल स्रोत की स्वच्छता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

हालांकि यह जिम्मेदारी केवल प्रशासन की ही नहीं, बल्कि नागरिकों की भी है। यदि कचरे को निर्धारित स्थान पर डाला जाए और नियमों का पालन किया जाए, तो स्थिति काफी हद तक सुधर सकती है।

प्रशासनिक संज्ञान का सबको है इंतजार

स्थानीय लोगों का आरोप है कि समस्या के बावजूद प्रशासन ने अब तक कोई ठोस संज्ञान नहीं लिया है। नहर की सफाई या कूड़ा प्रबंधन के लिए कोई स्थायी योजना लागू होती नहीं दिख रही।

दूसरी ओर, विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता है। यदि पंचायत स्तर पर नियमित कचरा संग्रहण, पृथक्करण और निस्तारण की व्यवस्था हो, तो ऐसी समस्याओं से बचा जा सकता है।

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर

नहर में जमा कचरा केवल सौंदर्य को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि पर्यावरण संतुलन पर भी असर डालता है। प्लास्टिक कचरा लंबे समय तक विघटित नहीं होता और जल गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।

इसके अतिरिक्त, गंदगी के कारण मच्छरों और अन्य कीटों का प्रकोप बढ़ सकता है, जिससे स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसलिए यह मुद्दा केवल सफाई का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है।

पंचायत व्यवस्था पर सबसे बड़ा प्रश्न

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता और कूड़ा प्रबंधन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से पंचायतों की होती है। लेकिन नांगल क्षेत्र में पंचायत स्तर पर कोई प्रभावी व्यवस्था नजर नहीं आ रही।

हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा स्वच्छता को लेकर विभिन्न अभियान चलाए जा रहे हैं, फिर भी जमीनी स्तर पर उनके क्रियान्वयन में कमी दिखाई दे रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि योजनाओं का लाभ वास्तविक रूप से गांवों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा।

सिविक सेंस की भी है परीक्षा

जहां एक ओर प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नागरिक जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि लोग स्वयं जागरूक होकर कचरे को नहर या सार्वजनिक स्थानों पर फेंकने से बचें, तो समस्या काफी हद तक नियंत्रित हो सकती है।

दरअसल, स्वच्छता केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए सामूहिक सहभागिता आवश्यक है। स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान और सामुदायिक भागीदारी से बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

समाधान की दिशा में संभावित कदम

विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या के समाधान के लिए बहु-स्तरीय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है।

  1. प्रत्येक गांव में पर्याप्त संख्या में सार्वजनिक कूड़ेदान की स्थापना।
  2. नियमित कचरा संग्रहण और निस्तारण की स्पष्ट व्यवस्था।
  3. प्लास्टिक उपयोग को कम करने और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने के प्रयास।
  4. नहर किनारे निगरानी और सफाई अभियान।
  5. शराब ठेकों के संचालकों को स्वच्छता मानकों का पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश।

इसके साथ ही, पंचायत और प्रशासन को मिलकर दीर्घकालिक योजना तैयार करनी चाहिए, ताकि नहर को पुनः स्वच्छ और सुरक्षित बनाया जा सके।

न उठाए गए कदम तो होगी बड़ी समस्या 

बिजनौर नांगल कूड़ा प्रबंधन की स्थिति केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वच्छता तंत्र की चुनौतियों को भी उजागर करती है। हालांकि फिलहाल प्रशासनिक स्तर पर ठोस कार्रवाई की प्रतीक्षा है, लेकिन यह स्पष्ट है कि समाधान के लिए सरकार और समाज दोनों की सहभागिता आवश्यक होगी।

यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है। इसलिए जरूरी है कि प्रशासन, पंचायत और स्थानीय नागरिक मिलकर स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ठोस पहल करें।

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