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जानिए कब है गंगा दशहरा का पावन पर्व: पढ़ें मां गंगा के धरती पर अवतरण की कथा और जानें पूजा की सही विधि

“न्यूज़ डेस्क”

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला पावन पर्व गंगा दशहरा हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है। मान्यता है कि इसी दिन मां गंगा स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। वर्ष 2024 में गंगा दशहरा का पर्व 25 मई, सोमवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। इस अवसर पर देशभर के गंगा घाटों पर श्रद्धालु स्नान, दान, पूजा और आरती कर मां गंगा का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

गंगा दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान कर अपने पापों के नाश और मोक्ष की कामना करते हैं।

जानिए मां गंगा का धार्मिक महत्व

भारत की धार्मिक मान्यताओं में गंगा नदी को देवी स्वरूप माना गया है। गंगा को पवित्र नदियों में सबसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। हिंदू धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।

इसके अलावा लोग अपने जीवन के अंतिम समय में गंगा तट पर रहने की इच्छा रखते हैं। वहीं, मृत्यु के बाद अस्थियों का गंगा में विसर्जन मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना जाता है। गंगा तटों पर पूजा-अर्चना, ध्यान और साधना का विशेष महत्व बताया गया है।

गंगाजल को अमृत के समान पवित्र माना जाता है। यही वजह है कि हिंदू धर्म के लगभग सभी संस्कारों और शुभ कार्यों में गंगाजल का उपयोग किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गंगाजल घर में सकारात्मक ऊर्जा और पवित्रता बनाए रखता है।

पढ़ें गंगा दशहरा का महत्व

गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य और मां गंगा की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा भाव से गंगा स्नान करने पर दस प्रकार के पापों का नाश होता है। यही कारण है कि इस पर्व को “दशहरा” कहा जाता है।

इस दिन श्रद्धालु गंगा घाटों पर दीपदान करते हैं और मां गंगा की आरती उतारते हैं। साथ ही पितरों की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान भी किया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से पूर्वजों को शांति प्राप्त होती है।

और जानें गंगा से जुड़े प्रमुख पर्व और परंपराएं

भारत में कई धार्मिक पर्व सीधे तौर पर गंगा नदी से जुड़े हुए हैं। इनमें मकर संक्रांति, कुंभ मेला और गंगा दशहरा प्रमुख हैं। इन अवसरों पर गंगा स्नान और दान का विशेष महत्व बताया गया है।

इसके अतिरिक्त गंगा तटों पर लगने वाले मेले भारतीय संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक माने जाते हैं। हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी और ऋषिकेश जैसे तीर्थ स्थलों पर लाखों श्रद्धालु एकत्र होकर मां गंगा की पूजा करते हैं।

गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की जीवनधारा मानी जाती है। यही वजह है कि गंगा तट सदियों से धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र रहे हैं।

मां गंगा के जन्म की पौराणिक कथाएं – जरूर पढ़ें 

गंगा नदी के जन्म और पृथ्वी पर अवतरण से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, मां गंगा का जन्म भगवान विष्णु के चरणों से हुआ था। कहा जाता है कि भगवान विष्णु के चरणों को धोने के बाद ब्रह्मा जी ने उस पवित्र जल को अपने कमंडल में भर लिया था। बाद में उसी जल से गंगा का प्राकट्य हुआ।

वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार, भगवान शिव द्वारा दिव्य संगीत प्रस्तुत करने पर भगवान विष्णु के शरीर से निकला पसीना ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में एकत्र किया और उसी से गंगा उत्पन्न हुईं।

शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि वैशाख शुक्ल सप्तमी को गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में पहुंचीं। इसलिए इस दिन को गंगा सप्तमी या गंगा जयंती के रूप में मनाया जाता है।

भगीरथ की तपस्या के बाद हुआ था माँ गंगा का अवतरण

गंगा अवतरण की सबसे प्रसिद्ध कथा राजा भगीरथ से जुड़ी हुई है। पुराणों के अनुसार, राजा सगर के 60 हजार पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनके उद्धार के लिए राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या कर मां गंगा को प्रसन्न किया।

भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हुईं। हालांकि, उनके तीव्र वेग को संभालना संभव नहीं था। तब भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया।

मान्यता है कि मां गंगा के स्पर्श से राजा सगर के पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ। इसी कारण गंगा को “भागीरथी” भी कहा जाता है।

जानिए गंगा पूजन और स्नान का फल

धार्मिक मान्यता के अनुसार गंगा दशहरा और गंगा जयंती के दिन गंगा स्नान तथा पूजा करने से रिद्धि-सिद्धि, यश और सम्मान की प्राप्ति होती है। साथ ही मांगलिक दोषों से पीड़ित लोगों को विशेष लाभ मिलता है।

इस दिन विधि-विधान से मां गंगा की पूजा करने, दीपदान करने और जरूरतमंदों को दान देने का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु इस अवसर पर घरों में भी गंगाजल का छिड़काव कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

आस्था और संस्कृति की प्रतीक हैं मां गंगा

गंगा नदी भारतीय जनमानस की आस्था का केंद्र है। सदियों से गंगा ने भारतीय संस्कृति, सभ्यता और आध्यात्मिक परंपराओं को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया है। यही कारण है कि गंगा को केवल नदी नहीं, बल्कि “मां” कहकर संबोधित किया जाता है।

गंगा दशहरा का पर्व लोगों को आध्यात्मिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को भी जीवित रखता है, जिसमें नदियों को जीवनदायिनी और पूजनीय माना गया है।

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