
रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा
लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख **मायावती** ने महिला आरक्षण, संसद के विशेष सत्र और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि महिला सशक्तिकरण पर चर्चा स्वागतयोग्य है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में ठोस कदम उठाना अधिक आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि महिलाओं के अधिकारों और राजनीतिक भागीदारी को लेकर लंबे समय से बातें होती रही हैं। हालांकि, ज़मीन पर अपेक्षित बदलाव सीमित दिखाई देता है। इसी संदर्भ में उन्होंने सही नीयत और मजबूत इच्छाशक्ति के अभाव पर भी सवाल खड़े किए।
संसद के विशेष सत्र पर प्रतिक्रिया
मायावती ने कहा कि संसद का विशेष सत्र बुलाया जाना एक महत्वपूर्ण कदम है। फिर भी, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि केवल सत्र बुलाने से ही उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि सामाजिक रूप से वंचित वर्गों की महिलाओं को वास्तविक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।

उन्होंने 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के प्रस्ताव का स्वागत किया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यदि इस आरक्षण के भीतर SC, ST और OBC वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से कोटा निर्धारित नहीं किया गया, तो इसका लाभ सीमित वर्गों तक ही सिमट सकता है।
SC-ST और OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा की मांग
प्रेस वार्ता के दौरान मायावती ने कहा कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं को वास्तविक अवसर तभी मिल पाएंगे, जब आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की व्यवस्था हो।

उन्होंने मंडल आयोग का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार OBC वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया गया था, उसी प्रकार महिला आरक्षण में भी स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए। उनके अनुसार, सामाजिक न्याय की अवधारणा तभी सार्थक होगी जब नीति निर्माण में समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।

इसके अलावा, उन्होंने सवर्ण महिलाओं के लिए भी 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग दोहराई और कहा कि सभी वर्गों की महिलाओं को न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
महिला सशक्तिकरण: कथनी और करनी के बीच अंतर
मायावती ने कहा कि महिला सशक्तिकरण पर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। हालांकि, व्यवहारिक स्तर पर कई बार अपेक्षित परिणाम नहीं दिखते। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों को स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक सामाजिक हित में निर्णय लेने चाहिए।

उन्होंने महिला सुरक्षा और सम्मान को भी आरक्षण से जोड़ते हुए कहा कि केवल संसद और विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। साथ ही, महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा और आर्थिक स्वावलंबन सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।
आरक्षण के लाभ पर संदेह क्यों?
मायावती ने यह आशंका भी जताई कि यदि आरक्षण की प्रक्रिया में स्पष्ट वर्गीय विभाजन नहीं होगा, तो पिछड़े और वंचित वर्ग की महिलाओं को पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा।

उन्होंने कहा कि पिछड़े वर्ग की महिलाओं को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता है। इसके लिए नीतिगत स्पष्टता और पारदर्शिता जरूरी है।

हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि महिला आरक्षण की दिशा में आगे बढ़ना एक सकारात्मक कदम है। लेकिन, इसे अधिक प्रभावी और समावेशी बनाने की जरूरत है।
सामाजिक न्याय की अवधारणा पर जोर
प्रेस वार्ता के दौरान मायावती ने सामाजिक न्याय की मूल भावना को दोहराया। उन्होंने कहा कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को बराबरी का अवसर देना है।

उनके अनुसार, जब तक नीति निर्माण में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक सामाजिक संतुलन स्थापित करना कठिन रहेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि महिला आरक्षण का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब इसे सही नीति, स्पष्ट दिशा और निष्पक्ष क्रियान्वयन के साथ लागू किया जाएगा।
राजनीतिक दलों को दी नसीहत
मायावती ने राजनीतिक दलों से अपील की कि वे इस मुद्दे पर संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठें। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण केवल एक राजनीतिक एजेंडा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि राजनीतिक दल व्यापक सहमति के साथ ठोस कदम उठाएं, तो महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है।

लखनऊ में आयोजित इस प्रेस वार्ता में मायावती ने महिला आरक्षण, सामाजिक न्याय और वर्गीय प्रतिनिधित्व जैसे अहम मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखी। उन्होंने संसद के विशेष सत्र और महिला आरक्षण प्रक्रिया का स्वागत किया, लेकिन साथ ही SC-ST और OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा सुनिश्चित करने की मांग दोहराई।

उनका कहना है कि सही नीति, स्पष्ट वर्गीय प्रावधान और मजबूत इच्छाशक्ति के बिना महिला आरक्षण का उद्देश्य अधूरा रह सकता है। इसलिए, आवश्यकता इस बात की है कि महिला सशक्तिकरण को केवल नीतिगत घोषणा तक सीमित न रखकर उसे व्यवहारिक रूप में लागू किया जाए।

इस प्रकार, यह प्रेस वार्ता महिला आरक्षण और सामाजिक न्याय की बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आई है। आने वाले समय में संसद और राजनीतिक दल इस विषय पर क्या कदम उठाते हैं, इस पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।



