
रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा
लखनऊ: शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित वर्ग के बच्चों को प्रवेश देने में अनियमितता बरतने वाले 55 निजी विद्यालयों को प्रशासन ने नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के संदर्भ में की गई है, जिसके बाद शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि पात्र बच्चों को समयबद्ध तरीके से प्रवेश दिलाना अनिवार्य है।

जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) ने प्रेस को जानकारी देते हुए बताया कि शहर के कई नामी निजी स्कूल RTE के तहत निर्धारित सीटों पर दाखिला देने में आनाकानी कर रहे थे। इसलिए विभाग ने संबंधित विद्यालयों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए एक सप्ताह के भीतर प्रवेश प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया गया हवाला
शिक्षा विभाग ने अपने नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय का हवाला दिया है, जिसमें कहा गया है कि RTE अधिनियम के प्रावधानों का पालन करना सभी मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों के लिए बाध्यकारी है। दरअसल, RTE कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समाज के कमजोर तबकों के बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का समान अवसर मिल सके।

अधिकारियों के अनुसार, यदि कोई विद्यालय RTE के तहत चयनित बच्चों को प्रवेश देने से इनकार करता है या अनावश्यक देरी करता है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसमें मान्यता पर पुनर्विचार, जुर्माना या अन्य प्रशासनिक कदम शामिल हो सकते हैं।

जानिए RTE अधिनियम का उद्देश्य और प्रावधान
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (राज्य में लागू प्रावधानों के अनुसार) के तहत कक्षा 1 या प्री-प्राइमरी स्तर पर निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रहती हैं। इन बच्चों की फीस और अन्य निर्धारित व्यय की प्रतिपूर्ति सरकार द्वारा की जाती है।

हालांकि, समय-समय पर यह शिकायतें सामने आती रही हैं कि कुछ विद्यालय प्रवेश प्रक्रिया में तकनीकी कारणों, दस्तावेजों की कमी या अन्य औपचारिकताओं का हवाला देकर दाखिला टालते हैं। इस बार विभाग ने स्पष्ट किया है कि पात्रता सूची में शामिल बच्चों को तत्काल प्रवेश दिया जाना चाहिए।

एक सप्ताह की दी गई समयसीमा
नोटिस में यह साफ कहा गया है कि संबंधित 55 विद्यालय एक सप्ताह के भीतर RTE के तहत चयनित सभी बच्चों को प्रवेश दें और उसकी सूचना विभाग को उपलब्ध कराएं। यदि निर्धारित समय सीमा में आदेश का पालन नहीं किया गया, तो संबंधित विद्यालयों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी।

इसके अतिरिक्त, विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य में RTE प्रवेश प्रक्रिया की निगरानी और अधिक सख्ती से की जाएगी। इसके लिए डिजिटल पोर्टल के माध्यम से डेटा अपडेट और नियमित समीक्षा बैठकें आयोजित की जाएंगी।

अभिभावकों में बढ़ी उम्मीद
इस कार्रवाई के बाद उन अभिभावकों में उम्मीद जगी है, जिनके बच्चों का चयन RTE के तहत हुआ है लेकिन उन्हें अभी तक प्रवेश नहीं मिल पाया था। कई अभिभावकों ने बताया कि वे कई बार विद्यालयों के चक्कर लगा चुके थे, लेकिन उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा था।

अब, विभाग की सख्ती के बाद उम्मीद है कि बच्चों का शैक्षणिक सत्र प्रभावित नहीं होगा और वे समय पर पढ़ाई शुरू कर सकेंगे। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि RTE का प्रभावी क्रियान्वयन सामाजिक समावेशन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

विभाग का सख्त रुख
शिक्षा विभाग ने दोहराया है कि RTE केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का माध्यम है। इसलिए किसी भी प्रकार की लापरवाही या नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

विभागीय अधिकारियों के अनुसार, आने वाले दिनों में अन्य जिलों में भी RTE प्रवेश की समीक्षा की जाएगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी पात्र बच्चा शिक्षा से वंचित न रह जाए।

जानिए आगे की कार्यवाही
यदि संबंधित विद्यालय समय सीमा के भीतर प्रवेश प्रक्रिया पूरी नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई संभव है। इसके साथ ही, विभाग अभिभावकों के लिए हेल्पलाइन और शिकायत निवारण तंत्र को भी सक्रिय रखने की तैयारी कर रहा है।

स्पष्ट है कि लखनऊ में RTE प्रवेश को लेकर यह कार्रवाई एक संदेश है कि शिक्षा के अधिकार से समझौता नहीं किया जाएगा। अब देखना होगा कि नोटिस प्राप्त विद्यालय निर्धारित समय में आदेश का पालन करते हैं या नहीं।



