कानपुर: 77 वर्षीय मरीज को लगा दुनिया का सबसे छोटा लीडलेस पेसमेकर, LPS में जटिल प्रक्रिया हुई सफल

रिपोर्ट – विवेक कृष्ण शर्मा
कानपुर: कार्डियोलॉजी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज करते हुए LPS इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने मैनपुरी निवासी 77 वर्षीय मरीज को दुनिया का सबसे छोटा लीडलेस पेसमेकर सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया। यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल मानी जाती है, विशेषकर तब जब मरीज की प्रमुख नसें पूरी तरह अवरुद्ध हों।

डॉक्टरों के अनुसार, मरीज “कम्पलीट हार्ट ब्लॉक” की गंभीर स्थिति से जूझ रहा था। इस अवस्था में हृदय की धड़कन सामान्य से काफी कम हो जाती है, जिससे बार-बार चक्कर आना, बेहोशी और अत्यधिक कमजोरी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। ऐसे मामलों में समय पर उपचार न मिले तो स्थिति जोखिमपूर्ण हो सकती है।
जानिए क्या थी चिकित्सकीय चुनौती?
वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. अवधेश कुमार शर्मा ने बताया कि मरीज की दोनों ऊपरी अंगों की नसें पूरी तरह बंद थीं। सामान्यतः पारंपरिक पेसमेकर इन्हीं नसों के माध्यम से हृदय तक पहुंचाया जाता है।

हालांकि, इस मामले में पारंपरिक सर्जरी संभव नहीं थी। नसों के अवरुद्ध होने के कारण सामान्य तकनीक अपनाना जोखिम भरा होता। ऐसे में डॉक्टरों के सामने सीमित विकल्प थे। यही वह बिंदु था, जहां आधुनिक चिकित्सा तकनीक ने समाधान प्रदान किया। विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. उमेश्वर पाण्डेय के अनुसार, मरीज को लीडलेस पेसमेकर लगाया गया, जिसमें कोई तार (लीड) नहीं होता।
जानिए क्या होता है लीडलेस पेसमेकर?
पारंपरिक पेसमेकर में एक छोटा उपकरण त्वचा के नीचे प्रत्यारोपित किया जाता है, और उससे जुड़े तार हृदय तक पहुंचते हैं। इसके विपरीत, लीडलेस पेसमेकर सीधे हृदय के भीतर स्थापित किया जाता है।

इसमें बाहरी तारों की आवश्यकता नहीं होती, जिससे संक्रमण और लीड से जुड़ी जटिलताओं की संभावना कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त, यह आकार में बेहद छोटा होता है और मरीज के शरीर में बाहरी उभार भी नहीं बनता।

मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, नसें बंद होने की स्थिति में लीडलेस पेसमेकर एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प साबित होता है। हालांकि इसकी प्रक्रिया अत्यधिक विशेषज्ञता और आधुनिक उपकरणों की मांग करती है।
कैसे हुई जटिल प्रक्रिया?
डॉक्टरों की टीम ने विशेष कैथेटर तकनीक की सहायता से पेसमेकर को सीधे हृदय के भीतर प्रत्यारोपित किया। पूरी प्रक्रिया अत्यंत सावधानी के साथ की गई।

प्रोफेसर डॉ. अवधेश कुमार शर्मा (FACC, USA; FRCP, USA) ने बताया कि ऑपरेशन के बाद मरीज की हृदय गति सामान्य स्तर पर लौट आई है। अब मरीज पूरी तरह स्वस्थ है और नियमित निगरानी में है।

इस पूरी प्रक्रिया में प्रोफेसर डॉ. उमेश्वर पाण्डेय, डॉ. अवधेश कुमार शर्मा, डॉ. सन्तोष कुमार सिन्हा, डॉ. एम. एम. रजी और डॉ. कुमार हिमांशु की प्रमुख भूमिका रही।
उपचार की लागत और सरकारी योजना का लाभ
संस्थान के निदेशक प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार वर्मा के अनुसार, इस प्रकार के लीडलेस पेसमेकर की लागत सामान्यतः 15 से 20 लाख रुपये के बीच होती है।

हालांकि, मरीज उत्तर प्रदेश सरकार की स्वास्थ्य योजना का लाभार्थी था। परिणामस्वरूप, उसे यह पूरा उपचार निःशुल्क उपलब्ध कराया गया। यह पहल दर्शाती है कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाएं गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकती हैं। विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह बड़ी राहत है।
संस्थान के लिए है बड़ी उपलब्धि
लीडलेस पेसमेकर प्रत्यारोपण को कार्डियोलॉजी की उन्नत प्रक्रियाओं में गिना जाता है। जब नसें बंद हों, तब यह प्रक्रिया और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

ऐसी स्थिति में सफल प्रत्यारोपण संस्थान की तकनीकी दक्षता और विशेषज्ञता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि क्षेत्रीय स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रेरणादायक है।

इसके अतिरिक्त, यह उपलब्धि दर्शाती है कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं अब महानगरों तक सीमित नहीं हैं। यदि सही संसाधन और विशेषज्ञ उपलब्ध हों, तो जटिल प्रक्रियाएं भी सफलतापूर्वक की जा सकती हैं।
पढ़िए हृदय रोगियों के लिए संदेश
कम्पलीट हार्ट ब्लॉक जैसी स्थितियों में समय पर जांच और उपचार अत्यंत आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति को बार-बार चक्कर आना, अत्यधिक थकान या बेहोशी की शिकायत हो, तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

साथ ही, आधुनिक तकनीकों के बारे में जागरूकता भी महत्वपूर्ण है। लीडलेस पेसमेकर जैसे विकल्प उन मरीजों के लिए वरदान साबित हो सकते हैं, जिनके लिए पारंपरिक सर्जरी संभव नहीं है।

मैनपुरी के 77 वर्षीय मरीज में लीडलेस पेसमेकर प्रत्यारोपण की यह सफलता न केवल चिकित्सा क्षेत्र में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि उन्नत तकनीक और सरकारी योजनाओं का समन्वय मरीजों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

समय पर निदान, विशेषज्ञों की कुशलता और आधुनिक उपकरणों के संयोजन से जटिल हृदय रोगों का प्रभावी उपचार संभव है। LPS इंस्टीट्यूट की यह उपलब्धि भविष्य में ऐसे कई मरीजों के लिए आशा की किरण बन सकती है।



