यूपी में शुरू हुआ ‘हम हैं न’ अभियान: एक रुपये रोज सहयोग से लावारिस और जरूरतमंदों की सेवा का है संकल्प

रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा
भारत ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर सामाजिक सरोकारों की भावना को मजबूत करने के उद्देश्य से कई संस्थाएं कार्य कर रही हैं। इसी क्रम में DONORCY SOCIAL WELFARE CHARITABLE ASSOCIATION द्वारा संचालित “हम हैं न” अभियान जरूरतमंदों, लावारिस और असहाय लोगों की सेवा के लिए एक अनोखी पहल बनकर उभरा है। इस अभियान का मूल उद्देश्य है—धरती के देवदूतों को एक मंच पर जोड़ना और मात्र एक रुपये प्रतिदिन के सहयोग से सेवा का व्यापक नेटवर्क तैयार करना।

सेवा का भाव: सम्मान से परे लिया गया है एक संकल्प
संस्था से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब उन्होंने सड़क पर पड़े बीमार, लावारिस और अपनों से बिछड़े लोगों की स्थिति देखी, तब मन में सेवा का भाव जागृत हुआ। यही वह क्षण था जब “हम हैं न” अभियान की शुरुआत हुई।

हालांकि, सामाजिक कार्यों में यश-अपयश, मान-अपमान और आलोचना जैसी स्थितियां स्वाभाविक रूप से सामने आती हैं। इसके बावजूद, संस्था के स्वयंसेवकों ने इन सबको पीछे छोड़कर सेवा को प्राथमिकता दी। उनका मानना है कि सच्चा सुख दूसरों के दुख को कम करने में ही निहित है।
एक रुपये रोज का मिशन: सामूहिक जिम्मेदारी की है पहल
अभियान की विशेषता यह है कि इसमें हर व्यक्ति मात्र एक रुपये प्रतिदिन का योगदान देकर जुड़ सकता है। यह छोटी सी राशि सामूहिक रूप से बड़ी मदद में बदल सकती है। उदाहरण के लिए, किसी बीमार लावारिस व्यक्ति का उपचार, जरूरतमंद परिवार की सहायता या गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज के लिए दवाइयों की व्यवस्था—ये सब सामूहिक सहयोग से संभव हो पाते हैं।

संस्था का उद्देश्य है कि अधिक से अधिक लोग इस प्लेटफॉर्म से जुड़ें और समाज में सहयोग की संस्कृति को मजबूत करें। इससे न केवल आर्थिक सहायता मिलती है, बल्कि समाज में संवेदनशीलता भी बढ़ती है।
वास्तविक उदाहरणों से मिली प्रेरणा
संस्था के कार्यकर्ता बताते हैं कि कई बार उन्हें ऐसे लोग मिले जो सेवा कार्यों को लेकर शंका जताते हैं। कुछ लोग यह भी पूछते हैं कि क्या इन गतिविधियों से आर्थिक लाभ होता है।

हालांकि, कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि उनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाना है। वे उदाहरण देते हैं—किसी अस्पताल के बाहर पड़े लावारिस मरीज की देखभाल, कैंसर पीड़ित गरीब परिवार की चिकित्सा व्यवस्था, या दृष्टि संबंधी समस्या से जूझ रहे बुजुर्ग की सहायता।

इन कार्यों में आर्थिक लाभ की नहीं, बल्कि मानवीय संतोष की भावना प्रमुख होती है। यही कारण है कि संस्था के स्वयंसेवक इसे “परम सुख” का अनुभव मानते हैं।
संस्था के पास हैं सामाजिक चुनौतियां और धैर्य
सामाजिक सेवा की राह आसान नहीं होती। कई बार आलोचना, गलतफहमी और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। फिर भी, संस्था से जुड़े लोग धैर्य और संयम के साथ आगे बढ़ते हैं।

वे मानते हैं कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए निरंतर प्रयास जरूरी है। इसलिए वे व्यवधानों के बावजूद अपने मिशन पर डटे रहते हैं। उनका कहना है कि यदि हर व्यक्ति थोड़ी-सी जिम्मेदारी ले, तो समाज में बड़े परिवर्तन संभव हैं।
सामुदायिक भागीदारी का भी है महत्व
“हम हैं न” अभियान केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है। यह एक विचारधारा है, जो लोगों को संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब समाज के लोग एकजुट होकर किसी उद्देश्य के लिए काम करते हैं, तो उसका प्रभाव व्यापक होता है। इससे न केवल जरूरतमंदों को राहत मिलती है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी मजबूती मिलती है।
पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर चल रही संस्था
किसी भी सामाजिक संस्था के लिए पारदर्शिता और विश्वसनीयता महत्वपूर्ण होती है। DONORCY SOCIAL WELFARE CHARITABLE ASSOCIATION का दावा है कि वह अपने कार्यों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

संस्था का लक्ष्य है कि सहयोग करने वाले लोग यह महसूस करें कि उनका योगदान सही दिशा में उपयोग हो रहा है। इसी विश्वास के आधार पर अभियान को आगे बढ़ाया जा रहा है।
सेवा ही सच्ची कमाई – के.के.सिंह
अंततः, “हम हैं न” अभियान यह संदेश देता है कि सच्ची कमाई धन से नहीं, बल्कि सेवा से होती है। जब कोई व्यक्ति बिना स्वार्थ के किसी की मदद करता है, तो वही समाज की असली पूंजी बनती है।

एक रुपये प्रतिदिन का छोटा-सा सहयोग भी किसी के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। इसलिए यह पहल केवल एक संस्था का प्रयास नहीं, बल्कि समाज के हर संवेदनशील नागरिक के लिए एक आह्वान है।

यदि समाज के अधिक लोग इस सोच को अपनाएं, तो निश्चित रूप से जरूरतमंदों के चेहरे पर मुस्कान लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है। यही इस अभियान की असली सफलता होगी।



