कानपुर: डिजिटल अरेस्ट साइबर फ्रॉड का खुलासा, 5 गिरफ्तार; 57 लाख के ट्रांजेक्शन चिन्हित

रिपोर्ट – शुभम शर्मा
कानपुर: कमिश्नरेट के साइबर क्राइम थाना पुलिस ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी करने वाले एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश करते हुए पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गिरोह ने पीड़ित को कई दिनों तक डिजिटल माध्यम से भय और भ्रम की स्थिति में रखकर बड़ी धनराशि ट्रांसफर कराई। पुलिस ने आरोपियों के खातों में लगभग 57 लाख रुपये के ट्रांजेक्शन चिन्हित किए हैं, जिनमें से कुछ धनराशि को फ्रीज भी कराया गया है।

यह कार्रवाई साइबर अपराधों पर नियंत्रण के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत की गई। पुलिस के अनुसार, गिरोह का नेटवर्क पांच राज्यों तक फैला हुआ है। साथ ही, जांच के दौरान कुछ अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन के संकेत भी मिले हैं, जिनकी पड़ताल की जा रही है।
जानिए क्या है पूरा मामला?
पुलिस के मुताबिक, पीड़ित को 9 अप्रैल से 21 अप्रैल के बीच तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” में रखा गया। आरोपियों ने खुद को पुलिस और एंटी करप्शन एजेंसी से जुड़ा अधिकारी बताकर संपर्क किया। उन्होंने पीड़ित को कथित आतंकी फंडिंग के मामले में नाम आने का डर दिखाया।

इसके बाद फर्जी कानूनी कार्रवाई का हवाला देते हुए पीड़ित को लगातार मोबाइल कॉल और वीडियो कॉल के माध्यम से निगरानी में रखा गया। इतना ही नहीं, आरोपियों ने एक नकली सेटअप तैयार कर उसे वास्तविक जांच प्रक्रिया जैसा दिखाया। परिणामस्वरूप, पीड़ित मानसिक दबाव में आ गया और आरोपियों के निर्देश पर आरटीजीएस (RTGS) के माध्यम से धनराशि ट्रांसफर कर दी।
पढ़िए कैसे काम करता था गिरोह?
जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह बेहद सुनियोजित तरीके से काम करता था। सबसे पहले, वे संभावित पीड़ित की पहचान करते थे। इसके बाद कॉल कर खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसी का अधिकारी बताते थे।

फिर, किसी गंभीर वित्तीय अपराध में फंसाने की धमकी दी जाती थी। स्थिति को विश्वसनीय बनाने के लिए फर्जी दस्तावेज, वीडियो कॉल पर वर्दी जैसे दृश्य और बनावटी कार्यालय पृष्ठभूमि का इस्तेमाल किया जाता था।

इसके अतिरिक्त, मोबाइल ऐप के जरिए पीड़ित की गतिविधियों पर निगरानी रखी जाती थी ताकि वह किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क न कर सके। इस तरह पीड़ित को अलग-थलग कर मानसिक दबाव बनाया जाता था। अंततः उससे बैंक ट्रांसफर के माध्यम से धनराशि वसूली जाती थी।
जानिए कौन हैं गिरफ्तार आरोपी और उनका नेटवर्क
पुलिस ने अब तक पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनमें मुख्य आरोपी राजू (निवासी झारखंड) शामिल है। इसके अलावा, उन खाताधारकों को भी पकड़ा गया है जिनके बैंक खातों का उपयोग ट्रांजेक्शन के लिए किया गया।

पूछताछ में सीआईएसएफ कर्मचारी दाउद अंसारी की संलिप्तता के संकेत भी मिले हैं। पुलिस ने बताया कि उसे पूछताछ के लिए लाया जा रहा है। हालांकि, उसकी भूमिका की पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही की जाएगी।

प्रारंभिक जांच से पता चला है कि गिरोह का नेटवर्क पांच राज्यों में सक्रिय था। इसलिए, अन्य राज्यों की पुलिस और संबंधित एजेंसियों से भी समन्वय स्थापित किया जा रहा है।
क्या-क्या बरामद हुआ?
गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से कई मोबाइल फोन और एक वाहन बरामद किया है। इन उपकरणों का उपयोग कथित तौर पर पीड़ितों से संपर्क और लेनदेन के लिए किया जाता था।

इसके अलावा, जिन बैंक खातों में लगभग 57 लाख रुपये के ट्रांजेक्शन पाए गए हैं, उनमें से कुछ खातों की धनराशि को फ्रीज कराया गया है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि धनराशि कहां-कहां ट्रांसफर की गई और किन-किन लोगों ने लाभ उठाया।
जांच की वर्तमान स्थिति
साइबर क्राइम थाना पुलिस ने बताया कि मामले की जांच बहु-स्तरीय तरीके से की जा रही है। एक ओर डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बैंकिंग लेनदेन की कड़ी जांच की जा रही है।

साथ ही, यह भी देखा जा रहा है कि क्या इस गिरोह ने अन्य लोगों को भी इसी प्रकार निशाना बनाया है। यदि ऐसा पाया जाता है, तो पीड़ितों की संख्या बढ़ सकती है। पुलिस ने आम नागरिकों से अपील की है कि यदि किसी को भी इस प्रकार की कॉल या संदेश मिले तो तुरंत साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराएं।

नागरिकों के लिए सावधानी
डिजिटल अरेस्ट साइबर फ्रॉड कानपुर जैसे मामलों को देखते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा फोन या वीडियो कॉल पर तत्काल धन ट्रांसफर करने का दबाव बनाना संदिग्ध संकेत हो सकता है।

इसलिए, नागरिकों को चाहिए कि:
- किसी भी अनजान कॉल पर अपनी बैंकिंग जानकारी साझा न करें।
- यदि कोई खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताए, तो उसकी पुष्टि आधिकारिक हेल्पलाइन से करें।
- दबाव में आकर धनराशि ट्रांसफर न करें।
- तुरंत 1930 साइबर हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करें या साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।

कानपुर पुलिस की इस कार्रवाई ने एक संगठित डिजिटल ठगी गिरोह का खुलासा किया है। हालांकि जांच अभी जारी है, लेकिन प्रारंभिक सफलता से स्पष्ट है कि तकनीकी विश्लेषण और समन्वित प्रयासों से साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।

डिजिटल अरेस्ट साइबर फ्रॉड कानपुर का यह मामला नागरिकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सीख है। डिजिटल युग में जहां सुविधाएं बढ़ी हैं, वहीं सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक है। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि प्रकरण में शामिल सभी व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।



