जानिए सीता नवमी का महत्व, पढ़िए कैसे करें व्रत-पूजा विधि और माता सीता के जन्म की पौराणिक कथा

रिपोर्ट – ब्रजेश शर्मा
हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को सीता नवमी का पावन पर्व मनाया जाता है। यह दिन माता सीता के अवतरण दिवस के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। सीता नवमी को जानकी नवमी भी कहा जाता है। यह पर्व रामनवमी के लगभग एक माह बाद आता है और विशेष रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में अवतार लिया, तब माता लक्ष्मी ने उनकी अर्धांगिनी के रूप में सीता का अवतार धारण किया। इस प्रकार, सीता नवमी केवल एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि आदर्श दांपत्य, त्याग और धर्मनिष्ठा की स्मृति का भी दिन है।

पढ़िए माता सीता के जन्म की पौराणिक कथा
माता सीता का जन्म मिथिला के राजा जनक के यहां हुआ। हालांकि, उनकी जन्म कथा अत्यंत विशेष और अद्भुत मानी जाती है। प्रचलित कथा के अनुसार, एक समय मिथिला राज्य में भीषण अकाल पड़ा। वर्षा न होने से जनता अत्यंत कष्ट में थी। तब ज्योतिषियों ने राजा जनक को परामर्श दिया कि यदि वे स्वयं हल चलाकर भूमि जोतेंगे तो राज्य पर लगे ग्रहदोष का प्रभाव समाप्त होगा और वर्षा होगी।

राजा जनक, जिनका वास्तविक नाम सीरध्वज था, ने अपनी प्रजा के कल्याण के लिए यह कार्य स्वयं करने का निर्णय लिया। जब वे खेत में हल चला रहे थे, तभी उनका हल किसी धातु की वस्तु से टकराया। उत्सुकतावश जब उस स्थान की खुदाई कराई गई, तो धरती से एक पेटी प्राप्त हुई। उस पेटी में एक नवजात कन्या थी।

चूंकि वह कन्या हल की ‘सीत’ (रेखा) से प्रकट हुई थी, इसलिए उसका नाम ‘सीता’ रखा गया। राजा जनक और उनकी पत्नी सुनयना ने उस बालिका को अपनी पुत्री के रूप में अपनाया। राजा जनक की पुत्री होने के कारण वह ‘जानकी’ नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।

इस प्रकार, माता सीता को भूमि पुत्री भी कहा जाता है, जो धरती की पवित्रता और सहनशीलता का प्रतीक मानी जाती हैं।
शिक्षा और संस्कार: आदर्श नारी का स्वरूप
राजा जनक विद्वान और धर्मपरायण शासक थे। उन्होंने सीता को शस्त्र विद्या, वेद, उपनिषद और अन्य शास्त्रों की शिक्षा दिलाई। साथ ही, उन्हें गृहकार्य और पाक कला में भी दक्ष बनाया गया।

कथा के अनुसार, बाल्यावस्था में ही सीता ने भगवान शिव के पिनाक धनुष को सहजता से उठा लिया था। यह देखकर राजा जनक को आभास हो गया कि यह कोई साधारण कन्या नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति का अवतार है। उसी समय उन्होंने संकल्प लिया कि सीता का विवाह उसी वीर पुरुष से होगा, जो शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में सफल होगा।

बाद में यही संकल्प सीता स्वयंवर का कारण बना, जहां श्रीराम ने धनुष भंग कर सीता का वरण किया। इस प्रकार, उनका विवाह धर्म, मर्यादा और आदर्शों का प्रतीक बन गया।
जानिए सीता नवमी का धार्मिक महत्व
सीता नवमी का पर्व विशेष रूप से महिलाओं द्वारा श्रद्धा से मनाया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। वहीं, अविवाहित कन्याएं उत्तम वर की कामना करती हैं।

इसके अतिरिक्त, यह दिन नारी शक्ति, धैर्य और समर्पण का भी प्रतीक है। माता सीता ने राजमहल के सुखों को त्यागकर वनवास का जीवन अपनाया। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। इसलिए, उन्हें त्याग, पवित्रता और पतिव्रत धर्म की प्रतीक माना जाता है।

इस तरह से करें व्रत और पूजा विधि
सीता नवमी के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। घर या मंदिर में भगवान श्रीराम और माता सीता की प्रतिमा स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा की जाती है।

पूजा में रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। सीता-राम के मंत्रों का जाप किया जाता है और रामायण या सुंदरकांड का पाठ भी किया जाता है।

इसके बाद, व्रत रखने वाली महिलाएं दिनभर उपवास रखती हैं और संध्या समय कथा सुनकर या पढ़कर व्रत का समापन करती हैं। कई स्थानों पर भजन-कीर्तन और सामूहिक पूजा का आयोजन भी किया जाता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश
सीता नवमी केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज को कई महत्वपूर्ण संदेश भी देती है। सबसे पहले, यह पर्व बताता है कि त्याग और धैर्य जीवन के कठिन क्षणों में भी शक्ति प्रदान करते हैं।

दूसरे, यह नारी के सम्मान और उसके योगदान को रेखांकित करता है। माता सीता ने अपने जीवन में अनेक परीक्षाएं दीं, लेकिन सदैव धर्म और सत्य के मार्ग पर अडिग रहीं।

इसके अलावा, यह पर्व परिवार में प्रेम, विश्वास और समर्पण की भावना को सुदृढ़ करता है। आज के समय में, जब पारिवारिक मूल्य चुनौती का सामना कर रहे हैं, तब सीता नवमी का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।

सीता नवमी 2026 का यह पावन पर्व श्रद्धा, आस्था और आदर्शों का उत्सव है। माता सीता का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, धैर्य, सत्य और समर्पण से जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।

इस दिन की पूजा और व्रत केवल परंपरा का निर्वहन नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों को आत्मसात करने का अवसर भी है। अतः सीता नवमी के इस पावन अवसर पर हम सभी को माता जानकी के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेना चाहिए।



