कानपुर: नगर निगम पर लगा पेड़ कटान के घोटाले का आरोप – नगर आयुक्त ने तत्काल लिया एक्शन – आगे पढ़िए

रिपोर्ट – शुभम शर्मा
कानपुर: नगर निगम एक बार फिर विवादों में घिर गया है। इस बार मामला आंधी में गिरे पेड़ों की लकड़ी से जुड़ा है। वार्ड 91 शास्त्री नगर के निर्दलीय पार्षद विनोद गुप्ता ने नगर निगम कर्मचारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि आंधी में गिरे पेड़ों की कटाई के बाद महंगी लकड़ी गायब कर दी गई। मामले ने तूल पकड़ा तो नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय को जांच के आदेश देने पड़े।

हालांकि नगर निगम प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी और यदि कोई दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पूरा मामला जांच के दायरे में है और रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
4 अप्रैल की आंधी के बाद शुरू हुआ विवाद
दरअसल, 4 अप्रैल को प्रदेश के कई हिस्सों में तेज आंधी और बारिश हुई थी। कानपुर के शास्त्री नगर क्षेत्र में भी इस दौरान करीब 15 पेड़ गिर गए थे। पेड़ गिरने से यातायात और स्थानीय व्यवस्था प्रभावित हुई, जिसके बाद नगर निगम ने कटिंग और हटाने का कार्य शुरू कराया।

बताया जा रहा है कि पेड़ों की कटाई के लिए प्राइवेट ठेकेदारों की मदद ली गई। पार्षद विनोद गुप्ता का आरोप है कि कटिंग के बाद लकड़ी को नगर निगम भेजा गया, लेकिन जिन पेड़ों की लकड़ी अधिक मूल्यवान थी, वह कथित रूप से रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुई।

यहीं से विवाद ने जन्म लिया। पार्षद ने आरोप लगाया कि लकड़ी के मूल्यवान हिस्से को व्यवस्थित तरीके से हटाया गया और नगर निगम के रिकॉर्ड में उसकी पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है।
पार्षद ने उठाए पारदर्शिता पर सवाल
पार्षद विनोद गुप्ता का कहना है कि पूरे मामले में पारदर्शिता का अभाव दिखाई देता है। उनके अनुसार, यदि पेड़ों की कटाई की गई थी तो उसकी मात्रा, वजन और भंडारण का पूरा विवरण सार्वजनिक होना चाहिए था।

उन्होंने यह भी कहा कि नगर निगम को यह स्पष्ट करना चाहिए कि गिरी हुई लकड़ी का निस्तारण किस प्रक्रिया के तहत किया गया। यदि लकड़ी की नीलामी हुई तो उसका रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जाए, और यदि लकड़ी स्टोर में जमा की गई तो उसका भौतिक सत्यापन कराया जाए।

हालांकि पार्षद ने किसी व्यक्ति विशेष को दोषी नहीं ठहराया, लेकिन उन्होंने विभागीय स्तर पर संभावित मिलीभगत की आशंका जताई है।
नगर आयुक्त ने दिए जांच के निर्देश
मामले के सार्वजनिक होने के बाद नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय ने कहा कि आरोप संज्ञान में आए हैं और उद्यान विभाग को जांच के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच निष्पक्ष तरीके से कराई जाएगी।

नगर आयुक्त ने यह भी कहा कि यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा उन्होंने यह भरोसा दिलाया कि नगर निगम की संपत्ति और संसाधनों के उपयोग में किसी प्रकार की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
जानिए प्रशासनिक प्रक्रिया क्या कहती है?
आम तौर पर नगर निगम क्षेत्र में आंधी या प्राकृतिक आपदा के दौरान गिरे पेड़ों की कटाई और हटाने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की होती है। कटाई के बाद लकड़ी का विवरण तैयार किया जाता है और उसे निर्धारित स्थान पर जमा कराया जाता है।

यदि लकड़ी उपयोग योग्य और मूल्यवान होती है तो उसकी नीलामी या अन्य प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई जाती है। ऐसे में रिकॉर्ड संधारण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यही कारण है कि इस मामले में रिकॉर्ड और भौतिक सत्यापन की मांग की जा रही है।
पढ़िए स्थानीय नागरिकों की प्रतिक्रिया
शास्त्री नगर क्षेत्र के कुछ स्थानीय लोगों ने भी कहा कि आंधी के बाद पेड़ों की कटाई हुई थी, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं है कि लकड़ी का क्या हुआ।

कुछ नागरिकों ने पारदर्शिता की मांग करते हुए कहा कि नगर निगम को सार्वजनिक सूचना बोर्ड या वेबसाइट के माध्यम से ऐसे मामलों की जानकारी साझा करनी चाहिए। इससे भ्रम और विवाद की स्थिति कम होगी।
राजनीतिक और प्रशासनिक आयाम
हालांकि यह मामला फिलहाल आरोपों और जांच तक सीमित है, लेकिन इसके राजनीतिक आयाम भी सामने आ सकते हैं। नगर निकाय से जुड़े मामलों में पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, और ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है।

दूसरी ओर, प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
जानिए आगे क्या?
अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर है। यदि आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं तो संबंधित कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई संभव है। वहीं यदि जांच में आरोप निराधार साबित होते हैं तो यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि मामला केवल भ्रम या गलतफहमी का था।

कानपुर नगर निगम में पेड़ कटान और लकड़ी प्रबंधन को लेकर उठे सवालों ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर चर्चा को तेज कर दिया है। हालांकि अभी जांच जारी है, लेकिन यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि सार्वजनिक संपत्ति के प्रबंधन में स्पष्ट प्रक्रिया और पारदर्शी रिकॉर्ड कितना आवश्यक है।

जांच रिपोर्ट आने के बाद ही पूरे प्रकरण की वास्तविक स्थिति सामने आएगी। तब तक प्रशासन और जनप्रतिनिधियों दोनों की जिम्मेदारी है कि तथ्यों के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जाए।



