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Dharm: जानिए श्रीराम की मृत्यु और हनुमान जी की भूमिका का बड़ा रहस्य: करें सिर्फ एक क्लिक

श्रीराम के जीवन का हर पल धर्म, भक्ति और न्याय की अनूठी मिसाल रहा है। उन्हें भगवान के रूप में पूजने वाले लाखों भक्तों के दिलों में वे एक आदर्श माने जाते हैं। लेकिन उनके जीवन का एक बेहद दिलचस्प और दार्शनिक पहलू भी है, जो उनकी मृत्यु से जुड़ा हुआ है। भगवान श्रीराम का निधन, हनुमान जी के साथ उनके अद्वितीय रिश्ते और मृत्यु के विषय पर एक विशेष दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसे समझना हर भक्त के लिए महत्वपूर्ण है। यह कहानी न केवल हमारे जीवन के अंतिम सत्य को स्वीकार करने का साहस देती है, बल्कि यह हमें जीवन और मृत्यु के चक्र को समझने में भी मदद करती है।

श्रीराम का मृत्यु का समय और हनुमान जी की भूमिका

जब श्रीराम जी को यह आभास हुआ कि उनका समय आ गया है, तो उन्होंने यह स्पष्ट रूप से जान लिया कि मृत्यु का आना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे कोई भी रोक नहीं सकता। भगवान श्रीराम ने यह स्वयं स्वीकार किया और हनुमान जी से कहा, “मेरे मृत्यु का समय आ गया है, मुझे यमराज को स्वीकार करने दो।”

हालांकि, हनुमान जी ने श्रीराम के इस विचार का विरोध किया। वे भगवान श्रीराम के प्रति अपनी निष्ठा और भक्ति में इतने समर्पित थे कि वे नहीं चाहते थे कि यमराज उनके प्रभु तक पहुँच सकें। हनुमान जी के लिए, श्रीराम का जीवन अमर था और वे उनका अंत देखना नहीं चाहते थे।

यमराज का डर और हनुमान जी का अद्भुत कार्य

यमराज, जो मृत्यु के देवता माने जाते हैं, अयोध्या में प्रवेश करने से डर रहे थे। कारण यह था कि हनुमान जी उनके सामने एक बड़ी चुनौती थे। वे भगवान श्रीराम के महल के मुख्य प्रहरी थे और उनके सामने कोई भी घुसने का साहस नहीं करता था। यमराज का कार्य अति कठिन था, क्योंकि हनुमान जी की उपस्थिति ने उनके प्रवेश को लगभग असंभव बना दिया था।

लेकिन भगवान श्रीराम ने इस स्थिति का समाधान निकाला। उन्होंने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छोटे से छेद में गिरा दी और हनुमान जी से उसे ढूंढने के लिए कहा। हनुमान जी ने अपना रूप छोटा कर लिया, ताकि वह इस छेद में प्रवेश कर सकें। जब वह छेद में दाखिल हुए, तो यह केवल एक साधारण छेद नहीं था, बल्कि एक सुरंग का रास्ता था, जो सीधे नागलोक में जाता था।

नागलोक में हनुमान जी की मुलाकात वासुकि से

हनुमान जी ने सुरंग के माध्यम से नागलोक की ओर यात्रा की, जहाँ उन्हें नागों के राजा वासुकि से मिलना हुआ। वासुकि ने हनुमान जी से उनकी यात्रा का कारण पूछा और उन्हें अंगूठियों का पहाड़ दिखाया। यह पहाड़ कई अंगूठियों से भरा हुआ था, जिनमें से प्रत्येक अंगूठी एक काल्पनिक चक्र का प्रतिनिधित्व करती थी। वासुकि ने कहा, “यहाँ आपको श्रीराम की अंगूठी मिल जाएगी।”

हनुमान जी ने अंगूठियों के ढेर को देखा और सोचा कि यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी। यह एक सुई के समान था, जिसे भूसे के ढेर में ढूंढना हो। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, जब हनुमान जी ने सबसे पहली अंगूठी उठाई, तो वह श्रीराम की ही अंगूठी थी। यह एक अद्भुत संयोग था। हनुमान जी ने अगली अंगूठी उठाई और यह भी श्रीराम की ही अंगूठी निकली। सभी अंगूठियाँ एक जैसी थीं, और यह बताती थीं कि भगवान श्रीराम का पुनर्जन्म और मृत्यु के चक्र का हिस्सा हमेशा बना रहेगा।

एक दार्शनिक संदेश: जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म

हनुमान जी ने महसूस किया कि उनके नागलोक में यात्रा करने और अंगूठियों के पर्वत को देखने का कोई साधारण कारण नहीं था। यह श्रीराम का उन्हें एक गहरे संदेश देने का तरीका था। श्रीराम की मृत्यु को कोई नहीं रोक सकता। यह संसार एक निरंतर चलने वाला चक्र है, जिसमें जीवन और मृत्यु दोनों का हिस्सा होते हैं।

वासुकि ने हनुमान जी को बताया, “हम जो संसार में रहते हैं, वह सृष्टि और विनाश के चक्र से गुजरता है। प्रत्येक सृष्टि चक्र को ‘कल्प’ कहा जाता है, और हर कल्प में चार युग होते हैं। त्रेता युग में श्रीराम का जन्म होता है, और एक वानर उनकी अंगूठी का पीछा करता है। यह अंगूठी समय के साथ गिरती रहती है, और यह चक्र अनंत काल तक चलता रहेगा।”

यह बात हनुमान जी के लिए एक गहरे दार्शनिक संदेश के रूप में सामने आई। उन्होंने यह समझा कि मृत्यु से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। जीवन एक यात्रा है, और मृत्यु इस यात्रा का एक हिस्सा है। जीवन चलता रहता है और हम सभी इस चक्र का हिस्सा हैं। श्रीराम जी भी पुनः जन्म लेंगे और हम भी।

हनुमान जी की यह यात्रा और उनकी अनुभवों से हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि मृत्यु कोई अंत नहीं है, बल्कि यह एक नया प्रारंभ है। श्रीराम की अंगूठी का पर्वत हमें यह सिखाता है कि जीवन और मृत्यु के चक्र में हम सब एकत्रित हैं और यह चक्र अनंतकाल तक चलता रहेगा। हनुमान जी के इस अनुभव ने हमें जीवन की अनित्यताओं को समझने और स्वीकारने का साहस दिया।

इस अद्भुत कथा के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि भगवान श्रीराम का जीवन और मृत्यु हमें जीवन के उद्देश्य और सच्चाई को समझने की प्रेरणा देते हैं।

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